🚶🚶🚶🚶🚶 ले चल मुझे भुलावा देकर ♠♠♠♠♠

बरसों बाद 'गाँव' जा रहा हूँ, अपने आप से मतलब रखने वाला शहरी जो हो गया हूँ, टाइम ही नहीं है किसी और के लिए, कई बार मन होता पर नही जा पाया, बहुत सी यादें जुडी हैं इस शब्द से, मेरे लिए गाँव का मतलब ढेर सारी मौसियों के घर, हाँ मेरी सभी चारों मौसियों की भी शादी मेरे ही गाँव में हुई है।  गाँव मतलब, बेरी के झाड़ वाली कांटेदार बाड़ वाली दीवारों वाले घर, खींप सीणीयाँ वाले वातानुकूलित झोंपड़े और ढूंडे, जिनमें जेठ की तपती दुपहरी में भी न जाने कैसे शीतल बयार बहा करती, तब भी जब बाहर हवा चलने का नामो निशान तक न हुआ करता। गाँव मतलब बालू मिट्टी के टीले, धोरे, जो कहते अभी अभी हज़ारों साँप यहाँ से गुज़रे हैं। कुछ धोरे तो इतने बड़े हो गए थे मानो खुद को पहाड़ कहलवाना चाहते हो,उन पर चढ़ कर पास के 3-4 दूसरे गाँव नज़र आते, गाँव मतलब होली, चंग की थाप पर थिरकते कदम, गींदड़ में लड़कों का लड़की बन होने वाला स्वांग, हंसी-ठिठोली। गाँव मतलब बरसात के पानी से बना अस्थायी तालाब 'नाडिया' और किनारे की बालू में लोट कर छलांग लगाओ नहा कर सब खुद को फेल्प्स की फीलिंग दे दो, सब कुछ वैरी सिम्पल। एंड फाइनली गाँव का मतलब जिंदगी, उससे जुड़े लोग, आत्मीयता, रीति-रिवाज और उन्हें निभाने की तन्मयता।  सब कुछ जैसे खो सा गया था, इसलिए इस बार जब मौसी जी के घर से बुलावा आया तो फटाफट प्रोग्राम बना डाला।

पूरे रास्ते गाड़ी चलाते वक्त गाँव की खुशबू को दूर से ही महसूस करने की चाहत के चलते बाहर तांक झांक करते आया, टीले अब उतने भूरे नहीं लग रहे, अकड़ कर खड़े रहने वाले धोरे भी अब सीधे हो रहे, जाने क्यूँ पर मेरा मन हरे भरे टीले स्वीकार नहीं कर पा रहा। मुख्य सड़क से गाँव की और घूमते ही मोहन चाचा नज़र आ गए, मोहन चाचा , इनकी गिनती गाँव के सबसे रईस लोगों में होती है , फूसकी (पुष्पा,चाचा की इकलौती बेटी) की शादी की धाक आज भी गांववालों के मन पर है,होती भी क्यूँ न  बेटी को तो इतना दिया की लड़के वालों को ले जाने में ही पसीने आ गए और तो और सभी बारातियों को भी चाँदी के बर्तन की यादगार भेंट दी गई थी। तब से बस अकड़ के चलते हैं , क्या मजाल जो किसी से सीधे मुँह बात कर लें। उनको देख मैंने गाड़ी से उतर उनके पांव छुए, बदले में आशीर्वाद रूप में 'हूँ' मिला, सीधे बोले कब आया?

'जी, बस अभी अभी चला आ रहा हूँ।'

चाचा एक और 'हूँ' में बात निपटा कर अपने रस्ते हो लिए। मैं उन्हें जाते देख रहा था। चाचा ऐसे तो न थे, बहुत मेहनती थे और ये शौहरत उन्होंने अपनी मेहनत से पाई थी विरासत में नहीं पर गाँव से बाहर शहर तक उन्हें ले जाने वाले पापा थे। आज उन्ही की संतान से अकारण ऐसी बेरुखी ? चलो जी कोई बात नहीं। सोचते सोचते गाड़ी बढ़ा दी।

गाँव में भी अब बाड़ की जगह ईंट की दीवारों ने ले ली है, कुछेक घरों में अब भी कांटेदार झाड़ की बाड़ है। दीवारें अच्छी नहीं लग रही मुझे, और कांटे खुशनुमा अहसास जगा रहे है, बड़ी हसरत से देखता आगे बढ़ा जा रहा हूँ। मौसी का घर झोंपड़ा नहीं रहा अब तो अच्छा खासा महल है , आज सज धज के और भी अच्छा लग रहा है पर झोपड़ी की चाह पूरी न होने से मन में कसक जैसा कुछ है। भीतर डीजे की कानफोड़ू ध्वनि गूँज रही। देखा कुछ बच्चे नाच रहे हैं 'भंडारे म् नाचे म्हारी बीनणी ए' गीत की धुन पर। डीजे है? पर ढोली क्यूँ नही ? स्वयं से प्रश्न करता मैं भीतर प्रविष्ट होने लगा। 'अरे रे रे रुक बेटा', मौसी जी अचानक एक थाली के साथ प्रकट हुई, 'टीका तो निकलवा ले, भाई की शादी में आया है इतना भी नही जानता? ' तप्त मन पर जैसे मरहम सी रख दी हो। गीला कुमकुम लगा भले ही माथे पर था पर शीतलता भीतर तक अनुभव हो रही थी। मौसी जी बहुत खुश नजर आ रही थी, स्वाभाविक भी था चार बेटे हैं उनके, सब के सब उम्र में मुझसे बड़े हैं, अच्छा खासा कमाते है, बिजनेस है रुपया पैसा भी है, और अब इकलौती बची हुई ख़ुशी भी उनकी होने जा रही थी, बेटे की शादी हो रही थी। अब तक शादी न हो पाने के कारण मौसी कुछ दुःखी से रहते थे पर अब सब ठीक होने जा रहा था।

सब शादी के कामों में लगे थे, मैं क्या करता, बोर होने लगा तो छत पर चला गया टहलने, सोचा देखूँ ऊपर से मेरा गाँव कैसा नज़र आता है। गाँव का शहरीकरण साफ नजर आ रहा था पक्के मकान, और उनकी छतों पर टंगे डी टी एच के छोटे छाते कुकुरमुते की तरह हर और दिख रहे थे। अचानक मदि भैया, मेरा मतलब मदन सिंह, मौसी जी के छोटे बेटे और हमारे बड़े भैया ने कंधे पर हाथ रखा।

'क्या यार, कब आए? और यहाँ क्या रहे हो अकेले में, खाना वाना कुछ हुआ के नही ?'

'हाँ भैया, खा लिया। नीचे कोई नहीं था बात करने को तो यहाँ आ गया।'

'अच्छा! चल अब नीचे चलते हैं। आजा।'

'हाँ भैया, पर एक बात बताइए। वो गोपाल काकोसा का घर है ना? ये उनके घर में साड़ी वाली औरत कौन है ?'

'हाहाहा, अरे भाई तू किस लोक से आया है, तुझे कुछ नहीं पता ? ये बहु है उनकी। रमेश की लुगाई'

'पर साड़ी? हमारी राजपूती ड्रेस क्यूँ नहीं पहनी इन्होंने ?'

'अरे भाई, वो हमारा पहनावा है इनका नही'

'मतलब?'

'मतलब ये भाई मेरे, कि हमारी जाति की है ही नहीं।'

'लव मैरिज है ?'

'हाहाहा तेरे यही समझ में आएगा शहरी बाबू। तू यही मान ले। चल अब आजा।'

नीचे आए, तो बहुत सारे परिचित और कुछ अपरिचित चेहरे घूम रहे थे। मैं वही भैया के साथ बैठ गया। सामने एक कमरा बाहर से बंद है, एक नज़र भर देखा फिर ध्यान हटा कर भैया से पूछा , अच्छा भैया बारात कहाँ जाएगी ?

भैया फिर से हंसने लगे। समझ नही आया की भैया किस पर हंस रहे, मेरी बात पर या मुझ ही पर :| और इसमें हंसने जैसा क्या था आखिर ? अपनी झेंप मिटाने को बोला की भैया मैं गाँव का चक्कर लगा के आता हूँ और बाहर निकल आया।
 ठाकुर जी का मंदिर आज भी वैसा ही है, सब पूजा-अर्चना करने जाएंगे पर पैसा-खर्चना कोई नहीं करता। चूने और पत्थर से बनी दीवारों तक को दीमक चाट गई हैं, प्रसाद पर मंडराते मकोडों के झुंड आज भी वैसे हैं जैसे पहले दिखाई देते थे। 'पीर जी के रोजे' के पास मेरी दूसरी मौसी का लड़का लक्ष्मण  नजर आया, शायद खेत से आ रहा था। सोशल मीडिया की चपेट में आकर ये भी लक्ष्मण से लकी हो गया है मुझे देखा तो भाग के करीब आया, गले लगाया बोला आप कब आए भैया, चलो घर।

सरोज मौसी ने खाट पकड़ रखी थी। मौसा जी तो अब रहे नहीं , उनके सिरहाने खड़ी लड़की ने घूँघट खींचा और अंदर चली गई। पूछा तो पता लगा लकी मियां ने शादी बना डाली किसी की लड़की भगा के, मौसी जी बताते वक़्त कुछ उदास नज़र आए फिर बोले 'चल भाग के ही सही आई तो अपनी जात वाली। आजकल तो जिसे देखो दूसरी जात में परणीज (विवाह) रहा है। और जात पात अब कौन देखता है सबको बीनणी चाहिए चाहे जैसे भी आए। पहले लड़के वालों की कदर होती थी अब लड़की वालों की है।' उनके शब्दों के सच के साथ परेशानी के निशानी उनकी पेशानी पर दिख गए, 2 लड़के और हैं अब उन्हें कौन अपनी लड़की देगा। मैं चलने को हुआ तो मौसी जी बोले, अपने भाइयों का ध्यान रखना, कोई लड़की हो तेरे ससुराल में तो बताना। 'जी मौसी जी, ये भी कोई कहने की बात है।' कहकर उनके पांव छुए और बाहर आ गया। लकी मेरे साथ ही हो लिया।

गांव के लोग अब भी कुएँ का ही पानी पीना पसंद करते हैं, लकी बता रहा था। सुना था कोई 'जर्मन योजना' से पालर पाणी घर घर पहुँचाने की स्कीम आई थी पर लोगों ने नकार दिया।

मुझे इन बातों में कोई रूचि नहीं बात बदलते हुए पूछा,' इस बार की होली कैसी रही ? '

'कैसी होली भैया, कोई होगा तभी तो रंग उड़ेगा।'

'मतलब?'

'अब किसके पास वक़्त है होली के लिए, सब बाहर रहते है पैसे कमाने का भूत सवार है सब पर, जिसके पास सब है उस पर भी, एक अजीब सी होड़ है सबसे आगे निकल जाने की, पर न जाने कहाँ'

'अच्छा छोड़ वो सब, प्रकाश भाईजी की बारात कहाँ जा रही है तुझे पता है ?'

'हाहाहा, क्या भैया आप भी, आपको नहीं पता ? बारात कहीं नहीं जा रही'

'हैं ? मतलब ? मैं समझा नहीं'

'अरे भैया, बीनणी पहले ही आ गई तो बारात की जरूरत क्या है ?'

'तू ढंग से बताने का क्या लेगा'

'हाहाहा बताता हूँ बताता हूँ, देखो भैया बारात दुल्हन को लिवाने ही तो जाया करती है न, अब सिस्टम बदल गया है, दुल्हन पहले आ जाती है तो लिवाने का कोई झंझट ही नहीं'

मुझे कुछ समझ नही आया फिर से, लकी को गुस्से से घूरा तो वो फिर से कहने लगा,' भैया यहाँ लड़कियाँ बची ही कहाँ है शादी के लिए, इक्का दुक्का जिनके हैं वो सब चाहते हैं कि उनकी बेटी की शादी तो कलेक्टर से करेंगे, गलत नहीं हैं ऐसा सोचना पर फिर बाकि लड़को का क्या होगा ? आपको पता है गाँव में इतने कुँवारे है कि कान काटो तो कुआं भर जाए। अब इन्ही कुँवारों ने ये स्कीम चलाई है, दूर दराज से किसी गरीब की बेटी को ले आते हैं पैसा देकर, उनका भी फायदा और इनका भी, अपने प्रकाश भैया भी उनमें से एक है। '

लकी चुप हो गया पर मेरे कान में 'गरीब की बेटी' शब्द गूँजता रहा। सोचने लगा,अपने धन से किसी का आँगन आबाद करने वाला तो सबसे बड़ा धनवान हुआ, पर क्या स्त्री की यही नियति है ? उसे किसी चीज की तरह खरीदा और बेचा जाए? जो बिक कर आई होगी उसे तो पता भी न होगा की खरीददार कौन है, कैसा है ? सोचने लगा, क्या रमेश और प्रकाश भाईजी जैसे लोग गलत कर रहे हैं? मौसी जी के यहाँ डीजे अब भी पूरी आवाज़ के साथ दहाड़ रहा था, पर मुझे लग रहा था जैसे ये शोर किसी की मजबूरी की सिसकियाँ दबाने का प्रपंच मात्र है, घुटन-सी होने लगी, चुपचाप वहाँ से निकल कर वापस लौट चला। ये मेरा वो गाँव है ही नहीं 😢😢😢

#जयश्रीकृष्ण

©अरुण

👽👽👽👽👽 पवित्र पापी ♠♠♠♠♠

स्कूल ऑफिस में हंगामे का माहौल है, 9 वीं कक्षा का एक छात्र और एक छात्रा,दोनों की उम्र लगभग 15-16 वर्ष) को कक्षा में अश्लील हरक़तें करते पकड़ा गया था। कक्षा के विद्यार्थी खुद उनकी शिकायत ले कर आए थे इसलिए संदेह के लिए कोई स्थान नहीं।  लड़के को पहले भी 'सुधर जाने की' कई चेतावनियाँ दी जा चुकी है इसलिए विद्यालय हित में उसकी टी सी काटना ही बेस्ट ऑप्शन है, सबका यही मत है। लड़के के मामा आए हैं अंतिम प्रयास करने, शायद लड़का कुछ पढ़ जाए। पर लड़के की आँखों में से शर्म गायब है और अब स्टाफ की आँखों में दया नज़र नहीं आती। टी सी ऑनलाइन कटेगी, मुझसे कहा गया तो शुभ कार्य में देर करना उचित न समझा। लड़का और उसके मामा चले गए , शर्मिंदगी से लड़की ने स्कूल आना बंद कर दिया, येप्पी .....लम्बी अनुपस्थिति का बहाना मिल गया, उसका भी नाम कट गया। स्कूल अब पाप मुक्त हो रहा है भई!

***

कक्षा 8 का एक लड़का, उम्र 14-15 वर्ष , पढ़ाई में डब्बा, जब भी क्लास होती तो हमेशा चुपचाप रहने वाला, आज अपराधी की तरह हाथ बांधे खड़ा था। एक और छात्र उसकी शिकायत जो लाया था, बोला सर इसने पूरी क्लास के सामने मुझे उल्टा पटक लिया......और......सर ये बहुत बुरा है।

सच में बहुत गुस्सा आया, कस के 4-5 तमाचे लगाए उसके और कहा अभी निकलो यहाँ से, और अपने पापा को बोलो की आकर टी सी लेकर जाएं, उन्हें लिए बिना वापस मत आना। लड़का खिसिया हुआ, बोला बैग ले जाउँ, मैंने कहा नहीं।

थोड़ी देर तक स्कूल के गेट के पास खड़ा रह कर लड़का वापस आया बोला, 'म्हारे घर कोई कोनी' (हमारे घर पर कोई नहीं है)

मैंने उसी गुस्से के साथ उसे कहा, 'कोई बात नहीं जब आ जाए तब आना पर अकेले मत आना। अब निकल।'

'बैग ले जाऊँ जी ?'

'ले जा, दफा हो।'

और वो दफा हो गया सच में, वापस नहीं लौटा। न उसके घर से कोई आया न वो खुद। आर टी ई में भी 45 दिन की अनुपस्थिति के बाद नाम काट सकते है, ड्रॉप आउट हुआ न ? कोई बात नहीं। कचरा निकला अच्छा है न। स्कूल को पाप का अड्डा नहीं बनने देना है।

***

आज ऑफिस में कुलदीप सर क्लास ले रहे है, कक्षा 7 के 2 छात्र धर्मपाल और राकेश,दोनों की उम्र लगभग 10-11 वर्ष, पकड़े गए थे। स्कूल के गेट के पास जो सरदार जी की छोटी सी गोली-टॉफ़ी वाली दुकान है वहाँ से ये लोग टॉफ़ी का मर्तबान चुरा लाए थे। पहले खूब पिटाई की गई, फिर पुलिसिया पूछताछ हुई धर्मपाल गेंहू के साथ पीसने वाली घुन्न निकला, वो बस चुराई हुई टॉफ़ी खाने वालों में था, राकेश मुख्य अपराधी के रूप में उभर कर सामने आया। पूरी प्लानिंग और योजना को कार्यरूप में रूपांतरित करने में उसी की मेहनत थी। धर्मपाल को पहली गलती पर माफ़ कर दिया, पर राकेश को घर भिजवाया गया, अरे भई पाप मुक्ति अभियान चालू आहे!
विनोद जी बता रहे, यार ये लड़का क्रिमिनल माइंड है, पिछले साल इस अकेले ने पूरी क्लास के बच्चों की किताबें फाड़ डाली थी। और यही है जिसने भंडारी का सर स्लेट मार के फोड़ दिया था, कल ये 6 कक्षा की लड़की **** के बारे में बात कर रहे थे, ये कम्बख्त खुद उसके चक्कर में हैं, और कह रहे थे इसका इसके उसके साथ चक्कर और पता नहीं क्या क्या.........

***
आज स्कूल से आते वक्त 'उस लड़की' को अपने घर की बड़ी महिलाओं के साथ कपास चुगने जाते देखा। निम्न आय वर्ग के परिवारों की महिलाएँ यहाँ कपास चुगने जाया ही करती है पर....ये बेचारी !!!?  सोचा एक हरकत और सब गड़बड़ कर लिया न, बिना बाप की बच्ची मुझे तुमसे सहानुभूति थी पर.......।  मन भर आया पर खैर! बाइक आगे बढा दी, रेलवे क्रॉसिंग पर उस लड़के को भी देखा जो अपने पिता को स्कूल नहीं ला पाया , एक लड़के के साथ उसकी बाइक पर पीछे बैठा था, ये तो शहर का छंटा हुआ बदमाश है इसके साथ ? पहले ही बिगड़ा हुआ है, अब तो सुधरने की गुंजाईश ही न रहेगी। 😢😢😢

आज राकेश भी अपनी  दादी को स्कूल ले कर आया है, नाम जो कटने वाला है, डर सबको लगता है गला सबका सूखता है। उसकी दादी की और देखा , लगभग 75-80 वर्ष की बूढ़ी औरत जिसने लम्म्म्बा सा घूँघट निकाल रखा था। उसके कुछ भी कहने से पहले मैंने बोलना शुरू कर दिया, ये ये है वो है ये करता है वो करता है पढ़ाई में जीरो है होमवर्क नही करता कभी भी, और तो और चोरी की एंड कुछ बातें तो बताते हुए भी शर्म आती है, क्या कहें बोल भी नही सकते वगैरह वगैरह। आप इसकी टी सी ले जाओ बस। मैंने ढिठाई से कह दिया।

 बेचारी वृद्धा धम्म से नीचे बैठ गई, बोली बेटा क्या करूँ इस उम्र में काम करती हूँ लोगो के घर पर, बाप मर गया इसका , माँ इसे मेरे पास छोड़ कर किसी और के साथ चली गई, अनपढ़ हूँ कुछ पढ़ा लिखा भी नही सकती संस्कार देने का वक़्त नही मिलता। और अब इस उम्र में मुझ बुढ़िया की कौन सुनता है ये भी नहीं सुनता हो सके तो तुम सुन लो, इसे स्कूल से मत निकालना, मैं तुम्हारे पाँव....... कहकर वो मेरे पैरो की और झुकने को हुई। मैंने उनके हाथ पकड़ लिए, जाने क्यों और कैसे आँख से एक बूंद ढुलक कर उनके हाथ पर गिरी, बस इतना ही कह पाया कि माताजी आप जाओ, कोई टी सी नहीं काटेगा। हो सके तो इसका ध्यान रखिए, हम भी विशेष ध्यान देंगे। बूढी औरत चली गई, घण्टों तक मेरे भीतर कुछ कचोटता कुछ टूटता सा रहा। स्कूल  पाप मुक्त हुआ या नहीं पर लग रहा था जैसे सबसे बड़ा पापी तो मैं ही हूँ।  हे मेरे कृष्ण....😢😢😢😢😢

#जयश्रीकृष्ण
©अरुण

👽👽👽👽👽 उल्लू ♠♠♠♠♠

हर शाख पे उल्लू बैठा है,
हर शख्स से दिल घबराता है,
जाने क्या होता गोलमाल,
चक्कर पे चक्कर आता है।
.
घनघोर अंधेरा घूम रहा,
है कौन जो यूँ टकराता है,
बिन बादल बारिश बरस रही,
मेंढक भी कोई टर्राता है।
जाने क्या किसे ढुंढने फिर,
है कौन जो यूँ चिल्लाता है?
हर शाख पे उल्लू बैठा है..
.
बड़ा अजब खेल सा होता है,
बड़ा गज़ब जो मेला होता है,
है कोई दुःख मे चूर यहाँ,
कोई अपने पे रोता है।
नाहक कुछ शोर मचाते हैं,
कुछ शोर से लगते थके हुए,
कुछ हैं जो ठगने आए हैं,
और बैठे हैं कुछ ठगे हुए।
जाने किसको क्यूँ जानबूझ,
है कौन जो यूँ बिलमाता है,
हर शाख पे उल्लू बैठा है......
.
काँटों के भरे बँवडर में,
दिखते किसलय भी खिले हुए,
हैं डरे डरे ,सुरभित,सिमटे,
और आशंका से घिरे हुए।
देखो यहाँ पुष्प कुचलने को,
उल्लू की नज़रें गड़ी हुई।
कईयो को कच्चा खाने की,
भुखी आशाएं पड़ी हुई।
भगवान क्यूँ चुप चुप बैठा है,
जाने क्यूं देर लगाता है।
हर शाख पे उल्लू बैठा है,
हर शख्श से दिल घबराता है...!

💭💫💭💫💭 तुझे याद हो के न याद हो ♠♠♠♠♠

मुझे याद है जब तुम हमारे पड़ोस में रहने आई थी, मैंने पहली बार किसी अनजान को देख अजीब सा अपनापन महसूस किया था। जब तुमने अपनी काली बड़ी विस्मित आँखों से मुझे घूरा था तो मैं झेंप गया था और तुम खिलखिला दी थी , तुम्हारा हँसना कितना अलग था जैसे घुघरुओं की खनक। तुम्हे पता है जब तुम्हारी और मेरी दीदी बहने बनी तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी। उनको मैं भी 'दी' कहता था, बहन वाला नही पागल 'वो' दूसरे वाला।😊

   तुमको हर बार बस इक झलक देख लेने की कोशिश हमेशा करता था कभी तुम्हारे घर के खुले दरवाजे में से, और कभी दरवाजे की ओट में झांकती परछाईनुमा आकृतियों में तुम्हारी परिकल्पना करता कि शायद ये तुम ही रही होगी। जब कभी दरवाजा बंद दिखता अच्छा सा नही लगता , गुस्सा सा आता था। बड़े हो रहे थे , तुम भी और मैं भी, और मेरे सपने भी, तुम उनसे अनजान रही होगी, शायद, पर तुम्हारी रहस्यमयी मुस्कान से लगता, जैसे जगती आँखों के सपनों की खबर तुमको भी थी।
एक दिन माँ, हाँ बाबा तुम्हारी माँ ने कहा था इसे थोड़ा पढ़ा दिया करो। ट्यूशन शुरू हो गई थी मैं तुमको पढ़ाता और पढ़ता भी था। कभी खो जाता तुम्ही को देखते देखते, फिर तुम झुंझला कर मुझे हिला देती, मैं तो पहले से हिला हुआ था, तुम्हारी छुअन से धुआं धुआं हो जाता। तुम मुझे देख कर मुस्कुराने लगती, कहती बुद्धू हो तुम तो सच में।

कॉलेज के उन मिट्ठू से दिनों की याद तो तुम्हे भी आती होगी, मैं हमेशा इंतज़ार करता था तुम्हारा और एक के बाद एक कई बसें गुजर जाती अनन्त पथ पर, तुम्हारा साथ जो चाहिए था , आधा घण्टा तो बहुत होता है आधा पल भी होता तब भी वही किया होता, कितनी हैरानी से देखा था तुमने जब संडे को भी वैसे ही इंतज़ार करते पाया था मुझे, और फिर से कहा था 'बुद्धू ही हो तुम'।

तुम्हे खुल कर कुछ भी कहने से न जाने क्यूँ एक डर से लगता था, डर सब कुछ खो देने का, सब दोस्त कहते बिना कहे क्या पाओगे, फिर उस दिन बड़ी घबराहट से,डरते डरते मैंने तुम्हे कॉलेज जाते वक्त किताब में 'सब-कुछ' लिखा एक खत रख कर दे दिया था। तुमने भी बड़ी चालाकी से आते वक्त किताब वापस कर दी थी, पर खत पढ़ा था तुमने, तुम ये भले न कहो पर किताब के बदले पन्ने गवाही दे रहे थे। तुम जन्मदिन भी नही मनाती थी अपना,और पता है वो मैं ही था जो तुम्हारे हर जन्मदिन पर कार्ड दे जाता था तुम्हारे घर चुपके से, तुम सोचती ये बिना नाम का कार्ड न जाने कौन बुद्धू लाया।

कौन जानता था तुम्हारे मन में क्या चल रहा है, मैं तो अपने मन की जानता हूँ जहाँ बस तुम ही तुम थी। मुझे पता है जरूर उस दिन जब तुम अपनी सहेली के साथ मेरी और इशारा करके खिलखिला रही थी तो जरूर मेरा मज़ाक उड़ा रही थी। बहुत रोक लेना चाहा पर दिल भर आया, दो दिन तक घर से बाहर नही निकला था मैं। तुम आई थी फिर बहाने से, कि नोट्स चाहिए, और चुपके से आँखें बंद कर दी थी मेरी। पर तुम तो आँखे बंद रहे तब भी नज़र आ जाती हो, नज़र आ गई थी और पहचान लिया था तुम्हें। तुमने सॉरी बोला था पहली बार, फिर मुस्कुराई और मैं खो गया था उसी मुस्कुराहट में।

उस रोज अंताक्षरी चल रही थी, और तुम मेरी और थी (मैं तो हमेशा से तुम्हारी और था, आज भी हूँ), बहुत रात ही गई थी, सब हंसी मजाक कर रहे साथ साथ,और अचानक तुमने मेरा हाथ पकड़ा था। क्या कहूँ क्या करूँ कुछ समझ ही नही आया, बस दिल में हज़ारों घण्टियाँ एक साथ बज उठी थी, मैं हाथ पर तुम्हारे हाथ की गर्माहट महसूस कर पा रहा था, गला सूख गया था। फिर टेढ़ी नज़र से तुमने देखा और मुँह बिचकाते हुए धीमे से कहा था बुद्धू ही रहोगे तुम तो।

मैं छत पर पतंग उड़ाता तो तुम भी आ जाती थी अपनी छत पर,और तब पेच लड़ने लगते, आसमान में भी और जमीन पर भी। फर्क इतना था कि जमीन पर हर बार मेरी पतंग कट जाती और लूटने वाली हर बार तुम ही होती। तुम कविताएँ किया करती थी , गुड़िया पर, घर पर , परिवार पर, बड़े अच्छे बोल हुआ करते थे, मुझे कुछ समझ नही आते, अच्छे लगते तो बस इसलिए क्योंकि वो तुम कह रही थी। मैं क्रिकेट खेलता गली में तो तुम मेरे लिए बाहर से हूटिंग करती, और जोश जोश में उड़ा दिया करता बॉल, जो सीधी सुनारों के घर उनके खाली पड़े नोहरे की और दौड़ लगाती, सब कहते जिसने फेंकी है वही लाएगा, मैं थोड़ा गर्व और थोड़ी खिसियाहट लिए बॉल लाने जाता ।

 तुम्हारी दीदी की शादी में तुम परी लग रही थी, बारात में आए ज्यादातर सब बस तुम्हे ही ताक रहे थे टुकुर टुकुर, बहुत गुस्सा आ रहा था उन सब पर, एक बुढ़ा तुम्हारे पापा से कह रहा था की ये बेटी हमे दे दो। क्यों भई क्यों दे दो आखिर, और कोई नही मिली तो मेरी वाली पे ही डाका। सॉरी यार, मन ही मन बुढ़े को खूब गालियाँ दी थी मैंने,दी की शादी न होती तो पता नही क्या करता,  जानता हूँ बुरा हूँ मैं पर क्या करूँ यार कंट्रोल ही नही हो रहा था। तुमने कहा था फ़िक्र न करो कुछ बुरा न होगा और मैं मान गया था हर बार की तरह।

माँ कहा करती थी की तुम और मैं बराबर हैं उम्र में, फिर तुम्हारे घरवालों को क्या जल्दी पड़ी थी तुम्हारी शादी करने की। और तुमने तो कहा था कुछ बुरा न होगा,  तुमने तो कभी खुद से बताया भी नही, बस घर आना बंद कर दिया। इज्जतदार घर की शरीफ लड़की जो हो, रिश्ता हो गया तो जो रिश्ता जुड़ गया था उसे ठोकर मारने में कोई बुराई कैसे नज़र आती। पता है मैं बहुत रोया करता था, तुम्हे शायद कुछ भी याद न हो , पर मैं कुछ भी नही भूला। ठीक कहा था तुमने बहुत बुरा हूँ मैं अपना तो छोडो अपने घरवालों का भी ख्याल नही किया, बुद्धू हूँ ना, तुम्हारे बिन नही जी पाया यार 😢😢😢😢।

#जयश्रीकृष्ण
©अरुण

Rajpurohit-arun.blogspot.com

🌛🌝🌙🌜🌚 मेरा चाँद मुझे आया है नज़र ♠♠♠♠♠


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'औरत होना ही गुनाह है और किसी की पत्नी होना उससे भी बड़ा गुनाह, सुबह से भूखी बैठी हूँ, इन्हें देखो कोई फ़िक्र नही। खुद को खाने का एक निवाला तक नसीब न हो तो पता लगे, खुद तो खा पी कर मौज उड़ा रहे होंगे सुबह से, यूँ नही की कम से कम आज तो जल्दी आ जाते। हुँह बैठे होंगे वही ऑफिस में दोस्तों के साथ गप्पे लड़ाते हुए, पता नही कौन दोस्त है, दोस्त है या दोस्तनियाँ किसे पता ? प्यार वयार सब ढकोसला है , सब झूठी बातें है, और मुझे देखो सुबह से एक बूंद पानी की भी नही पी। गला सूख रहा है, पर मेरी किसे परवाह ?'

' पहला करवा चौथ है मेरा, कितने अरमान होते है हर लड़की के,मेरे भी थे, सोचा था ससुराल में जा कर अपना हर वो ख्वाब पूरा करूँगी, जो मायके में रह कर पूरा नहीं कर पाई, हुँह किसे पता था नसीब ही खराब है मेरा। जन्म दिन पर भी सिर्फ एक टुच्चा सा केक काटा कोई गिफ्ट विफ्ट नही, गिफ्ट तो छोडो कोई मूवी तक नहीं दिखाई। हर चीज में रोना शुरू हो जाता है इनका। बोलेंगे 'गिफ्ट कहाँ से लाऊँ, घर की हालत तो तुम्हे पता ही है, समझा करो ना', 'सिनेमा यहाँ है कहाँ ,छोटा शहर है ना, कभी बड़े शहर चलेंगे तो जरूर ले चलूंगा बाबा, आई लव यू जान'।

'हुँह लव माय फुट, घर के लिए एक फ्री की नोकरानी चाहिए थी सो ले आए, शादी का नाम देकर। '

'फोन भी ऑफ , हद है, गुस्सा तो इतना आ रहा है ना कि क्या बताऊँ, ठीक है रखो फोन बंद, मुझे आपसे क्या करवाना है, आप तो चाहते ही यही हो मैं मर जाऊँ घुट घुट के। '

'चाँद भी नही दिख रहा अभी, कैसे दिखेगा ? अख़बार में भी तो आया था कि शाम 8:40 को चन्द्र दर्शन होंगे। 8:40 लिखा है तो 9 बजे ही मान के चलो, चाँद भी तो आज बहुत मनुहार के बाद निकलता है। पता नही ये कहाँ रह गए, आ जाओ न प्लीज, मुझे कोई गिफ्ट नही चाहिए, कुछ भी नही, बस आप आ जाओ। 😢😢'

ट्रिन ट्रिन , ट्रिन ट्रिन, ट्रिन ट्रिन

'हेल्लो, जी  नमस्ते भाभी जी, मैं अतुल बोल रहा हूँ , भैया का एक्सीडेंट हो गया है, आप जुबिन हॉस्पिटल आ जाओ जल्दी, प्लीज'

हड़बड़ाहट, बदहवासी, और प्रार्थना

'आइए भाभी, भैया यहां हैं, बेहोश हैं अभी'

'क्या हुआ इन्हें, कैसे हुआ'😢😢

' आपके लिए ये कान के बुँदे लाने गए थे, सुबह से रट लगा रखी थी इनके लिए, 2 महीने से ओवर टाइम भी कर रहे थे, भाभी भैया आपसे बहुत प्यार करते हैं ना ? वरना आजकल तो औरते भी अपने पति के लिए व्रत नही रखती, भैया तो सुबह से भूखे प्यासे थे, बोल भी रहे थे की चक्कर आ रहे हैं , जेवेलर्स शॉप के बाहर निकल कर जल्दी से आप तक पहुंचना चाह रहे थे , ऑटो में चढ़ते वक़्त एक कार की टक्कर लग गई।'
करुणा सन्न थी, आँसू अविरल बह रहे थे, उसके गर्म आँसू लगातार अनुज  के हाथ पर गिर रहे थे, सहसा अनुज ने दवा के नशे से भारी और बोझिल उनींदी आँखे खोल ली। तभी करुणा के फोन पर रिंग बज उठी
"मेरा चाँद मुझे आया है नज़र".
#जयश्रीकृष्ण
©अरुण

🚌🌚⛄🔥🍵🚌 वन्स इन ए कोल्ड नाईट ♠♠♠♠♠


जयपुर जाना है, अरे अपना वही एक काम और किसलिए , एग्जाम है यार। स्टूडेंट लाइफ में ज्यादा लगेज नही रखने का , ढोने का टँटा तो होता ही है एग्जाम सेंटर वाला मचमच करता है सो अलग, सब पता है मुझे, मैं तो बस से जा रहा हूँ ना तो लगेज वगेज का कोई झंझट ही नही। आज शाम की बस है , कल सुबह जयपुर , 9 से 10:30 एग्जाम, फिर शाम की बस से वापस, नेक्स्ट सुबह होम स्वीट होम, सब प्रोग्राम फिक्स है अपना। 😊 मारवाड़ी कभी रिस्क नही लेते।

शाम हो गई, बस अड्डे पर चहल पहल है काफी, सबको कोई न कोई सी ऑफ करने आया है मुझे कोई भी नही, अब अपना तो रोज का काम है कभी इधर -कभी उधर तो यूँ कि घरवाले भी सी ऑफ के पंगे से ऑफ हो गए मने पक गए हैं सो अब कोई नहीं आता छोड़ने । जेब में हाथ डाले टहल रहे हैं हम भी, 'आज मौसम बड़ा बेईमान है बड़ा' गाया जा रहा है मन ही मन धरमिंदर की माफ़िक, काश कोई हमें भी मजबूर कर देती तो मन में नहीं खुल कर गाते, मन ही मन में ट्रैक चेंज , 'मुझसे मुहब्बत का इजहार करती, काश कोई लड़की मुझे प्यार करती', ओहो पता है मुझे कि जनवरी है तो क्या हुआ, सब इंतेज़ाम कर लिए हैं, इधर आओ ये देखो अंदर 2 बनियान पहनी है उनके ऊपर 'रूपा' की इन्नर बोले तो गर्मा गर्म, फिर शर्ट देन ये रेग्जीन वाला कोट, सर्दी की माँ की आँख में सुरमा। अब बोलो क्या बोलते हो , हमेशा याद रखने का ,क्या, मारवाड़ी कभी रिस्क नही लेता। खी खी खी 😊😊

कल्पना ट्रेवल्स , 1X2 बस है , सिंगल सीट पर हम विराजमान हो चुके है, बाक़ी लोग भी अपनी अपनी गोमती धरने के लिए सीट/स्लीपर का रुख कर रहे हैं। बस अब चलने को है, भीतर स्नैक्स का दौर चल चुका है अंकल चिप्स के लिफाफों में हाथ घुसने का शोर बस के इंजन की आवाज़ में भी सुना जा रहा है, हम घर से रोटियाँ ठूस कर आएं है गले तक, नो रिस्क रे बाबा, रास्ते के भोजन का क्या भरोसा कैसा हो? मिले भी की नही? अपन आराम से सीट पर पसरे पड़े हैं। हुँह जनवरी, बस में लोग है इंजन है, सब गर्म गर्म हो जाता है, कोई ठंड वंड नही लगेगी।

बस चल पड़ी, सब यात्री दुबक कर बैठे है। चलने के साथ साथ बस भी ठंडी होती जा रही है। अभी तक हालात काबू में है, मुझे अपने रेग्जीन के कोट और रूपा की गर्म वाली इन्नर दोनों पर पूरा भरोसा है। शीशे पूरी तरह से कस के बंद कर लिए है मैंने भी, पर अगर गलती से भी हाथ शीशे से छू जाए तो सिरहन सी दौड़ रही है। मैंने हाथ पेंट की जेब से निकाल कर बगल में दबा लिए हैं, संगरिया अड्डा पहुँच गए, बस कोल्ड स्टोर वाली फीलिंग देगी सोचा न था। रूपा और रेग्जीन दोनों पर भरोसा बनाये रखना चाहता हूँ पर ठंड की ताकत उन दोनों की सम्मिलित शक्ति से कई गुना ज्यादा मालूम पड़ती है। ध्यान में बार बार ठंड ठंड और ठंड यही आ रहा है। भीतर नजर दौड़ाई सब के सब जुगाड़ साथ लाए हैं, कोई मोटा कम्बल तो कोई रजाई को अपने चारों और करीने से लपेट रहा है। सही है, वैसे थोड़ा बहुत तो लगेज लेकर ही आना चाहिए, नहीं लाए तो अब भुगतो। सर्दी सहन शक्ति की परीक्षा ले रही है और अभी तो पूरे 9 घण्टे और लगेंगे। 😱😱😱

लगता है बस तो जैसे बाहर भीतर एकात्म को प्राप्त कर चुकी, सर्दी अब सहना असम्भव हो रहा है, ऊपर तो फिर भी ठीक है पर शरीर का निचला हिस्सा तो सुन्न होने लगा है, 😨😨, बगल से हाथ निकाल कर पाँवो को रगड़ रगड़ कर गर्म कर रहा हूँ, अख़बार में बहुत सी खबरें होती है जिन पर कोई ध्यान नहीं देता, मैं भी नही, कल ऐसी ही एक और खबर छपेगी, "ठंड से एक मरा", 😢😢 राजियासर में बस हमेशा रूकती है ड्राइवर कंडक्टर और सवारियाँ सब चाय पानी पिया करते है, पहले जब भी ड्राइवर यहाँ रोक करता था तो गुस्सा आता था , क्या जरूरत है 2 घण्टे हुए है बस और इनको चाय चाहिए हुँह, पर आज ड्राइवर पर बड़ी श्रद्धा हो आई, मन ही मन उसे आशीर्वाद दिया, बस से बाहर निकलते ही देखा कुछ लोग थोड़ी सी आग जला कर ताप रहे है, वाह परमानन्द यही परम् सत्य है, जीवन का सर्वोत्तम सुख, मैं भी तापने में लगा हूँ, मर रहे पैरों में थोड़ी जान आने लगी है। पर ये क्या, बस ने पौं पौं बजा दिया, उफ़्फ़ इतनी जल्दी , ऐसी भी क्या जल्दी है इनको जयपुर जाने की 😬😬😬। एग्जाम तो 9 बजे है पहुँच जाएंगे आराम से, गधा कहीं का।

बस में घुसते ही अपनी लाचारी पर रोना और गुस्सा दोनों आ रहे हैं ,मन तो कर रहा है किसी का कम्बल छीन लूँ पर सुना है सर्दी में पिटाई हो तो दर्द लम्बे समय तक रहता है। सब नींद में घूक हो रहे है बेशर्म, देखो दुष्टों तुम्हारी ही प्रजाति का एक मासूम नर अकाल मृत्यु की और बढ़ रहा है, दाँत जबर्दस्ती किटकिटाने लगे है, पैरों के साथ साथ अब तो  हाथ भी काँप रहे , और हाथ ही क्या होल बॉडी काम्पिंग 😢, अब इससे पहले की दिमाग सुन्न होकर काम करना बंद कर दे कुछ कर, कुछ कर "हिरन", अब ये मत पूछना कि हिरन कौन, अरे मैं ही हूँ जिसकी दास्ताँ सुनते सुनते आप यहाँ तक आ गए, आप भी सोचिए कि क्या करूँ, कुछ नही सूझा मुझे तो कोट की जिप खोली, अच्छा खासा खुला खुला सा है ये , पैर मोड़ लिए कोट ऊपर से बंद, छोटा सा बैग लग रहा हूँ, थोडी सी राहत, अपने शरीर से गर्मी बाहर नही जाने दूंगा, बाहर की नश्तर जैसी हवा अब कम छू पा रही है, सीट पर बैठने में बहुत असुविधा हो रही पर मैं खुश जैसा ही हूँ। पर कब तक, ठंडी हवा ने हार थोड़े न मानी है, भीतर भीतर मेरी कँपकँपी जोर शोर से जारी है। बेहोशी सी छा रही उफ़्फ़।

'अरे भाई उठ, जयपुर आ गया।'

हैं!!?, सुबह के 5:30 हुए हैं, समझ नही आ रहा, सब सपना था या हकीकत। नहीं नहीं सपना नहीं, अब भी कोट में घुस के जो बैठा हूँ, ज़िप खोल खुद बाहर आया पर ठंडी हवा के झोंके ने अंदर तक हिला डाला, बस से उतरते ही गेट के पास ही पोलो विक्ट्री सिनेमा के पास कुछ लोग आग से ताप रहे , मैं भी वहीं जिन्दा रहने की जुगत लगा रहा हूँ। एक अंकल आए पीछे से, शायद मेरी ही बस में थे, और मुझे अंदर घूर भी रहे थे, उन्होंने अपना कम्बल दिया मुझे,मैंने एक बार भी औपचारिकता निभाने के चक्कर में ना नही बोला, फटाफट कम्बल लेकर ओढ़ लिया, ये भी नही पूछा की अंकल पहले क्यूँ नही दिया, अंकल ने चाय ला कर दी, जमे और रुद्ध गले से आखिर फूट पड़ा ".थैंक्यू अंकल"। अंकल कुछ देर बतियाए, बोले ऐसे फिर कभी 'रिस्क नही लेना'। 'जी अंकल', लग रहा था अंकल कोई फरिश्ता हैं। कुछ देर में वो अपना कम्बल समेट कर चले गए, पर अब दिक्कत नही, सुबह होने को है, आग भी है, जिन्दा बच जाऊंगा अब मैं, डोंट वरी।

एग्जाम दिया, फिर तुरन्त मोटा सा कम्बल खरीदा,क्यूँ? अरे ये भी बताना पड़ेगा ?  वापस भी तो उसी बस से जाना है। और हाँ अब तो पक्का है पक्का, मारवाड़ी सच में रिस्क नहीं लेंगे, हाँ नही तो। 😊😊😊

#जयश्रीकृष्ण

©अरुण

‘बाल’-कथा ♠♠♠♠♠



जब मैं कॉलेज में था उन दिनों मेरे कुछ विनोदी मित्र चुहल करते हुए मुझसे कहा करते थे कि यार तेरा ये सरनेम बड़ा मस्त है  ‘राज-पुरोहित’ तुझे तो राजाओं वाली फीलिंग आती होगीनहीं ?। वे ये कह कर मुस्कुराते तो उनके साथ मैं भी हंस लिया करता। वो लोग मुझे प्राउड फील करवाने के लिए ऐसा कहते थे या टांग खींचने के लिए अपन ने कभी इस की टेंशन नहीं लीकबीर दास के दोहेऊँचे कुल का जनमिया जे करनी ऊंच न् होईसुबरन कलस सुरा भरासाधु निंदा सोई‘, ने मुझ पर कुछ ज्यादा ही असर किया है तो मात्र नाम के साथ किसी जाति विशेष का परिचायक शब्द का जुड़ना किसी गर्व का कारक कभी अनुभव ही नही हुआ। पर अपनी इसी जाति में जन्म लेने से लाभ जैसी स्थिति बहुत सी प्रथाओं जैसे विवाहों में कई बार अनुभव हुई 
विवाह को वाकई उत्सव का रूप दे दिया जाता है और कई दिनों तक लगातार छोटी छोटी रस्मों और उन में छिपे आनन्द का रसपान चलता रहता है। संभव है आप मेरी उपरोक्त बात से जुड़ न् पाए होबहरहाल ऐसा होना स्वाभाविक भी है,  ढोली के गीत  ‘तालरिया मगरिया रे मोरू बाई लारे रियाके शब्दों में छुपे आनन्द को इन शब्दों के अर्थ को जीने वाला कोई राजस्थानी ही ज्यादा सहजता से चख सकेगा।
खैर वो सब छोड़िए वैसे भी ऐसा बिलकुल नही है कि मुझे भी इस जाति का सब अच्छा ही लगता है चलिए अब जो नहीं पसंद उसी की बात करते हैं। जब मैं छोटा था यही कोई ३-४ साल का तो मेरे दादा जी का देहांत हो गयाज्यादा नहीं बस धुंधला सा याद है। मृत्युभोज का कार्यक्रम १२ दिन तक चलता है हमारे यहाँहम बच्चे भी बड़ो के रोने धोने के बीच गाँव में वही सेलिब्रेट कर रहे थे। अचानक देखा एक नाई भी आया हुआ है।
फिर पता लगा कि ये बाल काटेगा
पर किसके ?
किसके क्या, सब के भई
सब के ?
अरे मेरा मतलब सब पुरुषों के यार
आईंऐसा क्यूँ?
रिवाज है भई
ये क्या बात हुई, हैं ?
किसी ने इस सवाल का जवाब नहीं दियादेखते ही देखते एक के बाद एक सर सफाचट होने लगा । छोटे दादा जीताऊ जी पापा सब की शक्लें अजीब लग रही थीखूब हंसी आ रही थी पर चाचाओं के बाद आखिर बच्चों की भी बारी आ गई। हंसी की जगह खौफ ने ले लीबड़े ताऊ जी के दोनों बेटों के बाल मेरे सामने देखते देखते शहीद कर दिए गए लग रहा था सर की जगह उलटे तरबूज ही रखे होंछोटे ताऊ के एम पी रिटर्न  बेटे उन दिनों कुछ ज्यादा फैशनेबुल हुआ करते थे, हम लोग उन्हें कनाडा रिटर्न से कम महत्व नहीं देते थे, उनकी बारी आई तो वो बोले मैं तपला नही करवाऊंगा।बस एक ही डायलोग और सब पस्त , किसी कि फिर बहस करने कि हिम्मत न हुई . उनके बाद लडकों में मेरा ही नंबर था , यूँ कहने को तो मैं भी गाँव से नहीं शहर से आया था पर राजस्थान के किसी भी शहर से आना उनके लिए कोई विशेष बात न थी . मुझे (जबरदस्ती) लिवाने के लिए बन्दर टोली रवाना हुईऔर जैसा की उनसे अपेक्षित भी था ढेर सारी चिल्लम चिल्ली के बीच में मुझे नाई के सामने हाजिर कर दिया गया। मेरा आखिरी हथियार मतलब रोनातो निष्फल हो चुका था। अब और कोई उपाय न् देख खतरनाक रोना रोते हुए सर हिलाते हुए इधर उधर हाथ पैर मारने शुरू कर दिएनाई देव का हजामत का सारा पिटारा ठोकर लगने से अस्त व्यस्त हो गया,तिस भी आगे बढ़ कर उन्होंने अपने कर्तव्य की पूर्ति करनी चाही न् जाने एक लात उन्हें कहाँ और कैसे लगी कि वहीं पेट पकड़ कर उकड़ू होकर बैठ गएचाचा जी अब तक सब देख रहे थे ने बदतमीज बोलते हुए मेरे एक चांटा मारारोने के स्वर को और बल मिल गया,भय के साथ अब दर्द से मेरा भोम्पू सुपर से ऊपर वाला साउंड इफ़ेक्ट दे रहा था। पापा ने आकर मुझे चुप कराने की चेष्टा कीउनके प्रयास काम न् आए तो मुझे भीतर माँ के पास भेज दिया गया। सब बहला रहे थेदादा के लिए रोना छोड़ मेरे रोने की चिंता सब पर हावी थीफिर पता लगा नाई देव को वापस दान दक्षिणा देकर विदा कर दिया गया था। जान में जान आईझापड़ खाई तो क्या हुआ बाल तो बच गए।
हरिद्वार में फूल बहानेपापा के साथ मैं भी गया थाउनके कंधे पर सवारगंजे सर पर हाथ फेरने से छोटे छोटे काँटों वाला बड़ा ओव्सम अहसास आता है ये उसी रोज पता लग गया था। घर वापस आए तो मामला पहले की अपेक्षा कुछ शांत लगाघर टकलिस्तान लग रहा था पर मेरा छोटा सा संसार मानो उन 1000-1000 वाट के बल्बो से जगमगा उठा। जब तक वहाँ रहे तबला बजाने का अभ्यास निरन्तर जारी रहातबला बदल बदल कर।

#जयश्रीकृष्ण
©अरुण


🎪🎪🎪🎪 तिरुशनार्थी ♠️♠️♠️♠️

एक बार एग्जाम के लिए तिरुपति गया था। घरवाले बोले जा ही रहे हो तो लगे हाथ बालाजी से भी मिल आना। मुझे भी लगा कि विचार बुरा नहीं है। रास्ते म...