👤👥👤👥👤 आप भला तो जग भला ♠♠♠♠♠ .


मेरे एक मित्र हुआ करते थे , जब देखो किसी न किसी की बुराई किया करते , जब भी उसके पास जाना होता या वो मेरे यहाँ आते तो उनके मुख से परनिंदा सुने बिना वार्ता ही पूर्ण न होती।
“अबे वो , वो तो महाघटिया बन्दा है ....”
“वो ? वो तो चोर है साला ...एक दिन तो .....”
“उसकी तो बात ही मत किया कर घिन्न आती है ...”
“छोड़ यार , मूड ही खराब हो गया , किस मनहूस का नाम ले लिया ...”
“उसका तो पूरा खानदान ही लुच्चों का है ....”
मैं शहर में रहता जरुर हूँ पर ज्यादातर समय घर पर बीतता है, बाज़ार में जाने से भी कोफ़्त होती है, यूँ की आप चाहें तो इसे भी मेरे संदर्भ में आलस्य का एक विशेष दशा की संज्ञा दे सकते है। अब जब घर से बाहर नहीं जाता तो जान पहचान का दायरा भी सीमित ही है, मित्र की बातें बड़ी विचित्र लगती कभी कभी सोचता भी कि क्या सब के सब बुरे या बेकार लोग ही हैं इस शहर में?
एक दिन एक अन्य मित्र ने डपटते हुए पूछा कि ,”अबे कोई और नहीं मिला दोस्ती के लिए ....? कोई उसके मुँह तक नही लगता, यहाँ तक कि पूरा परिवार बदनाम है इसका ? इसकी माँ को जानता है ? कभी सुना नहीं कि वो अपनी खुद की बेटियों को कितनी गन्दी गन्दी गालियाँ देती है , कोई दुश्मनों से भी ऐसे बात करता होगा? कभी देखा है जब बाज़ार में सामान लेने जाती है तो लोग लागत से भी कम पर सामान दे देते हैं उसको , जानते हो क्यूँ ? क्यूंकि अगर वो ज्यादा देर तक उनकी दुकान पर खड़ी रही तो कोई दूसरा ग्राहक उसकी दूकान में नहीं घुसेगा।”
ऐसा नहीं था कि ये सब मुझे बिल्कुल पता न था पर जाने क्यूँ इन सब बातों को कोई तवज्जो देना ठीक न लगा , वो या उसका परिवार आपस में या दूसरों से कैसा व्यवहार करता है इससे ज्यादा उनका मेरे साथ अच्छा व्यवहार महत्वपूर्ण लगा, शायद मुझे ऐसा अभी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।
कुछ समय गुजरा एक दिन मित्र के भाई बदहवास से दौड़ते हुए आए , पता लगा मित्र को मेरी सहायता चाहिए, मित्र किसी निजी संस्था में कम्प्यूटर अध्यापक था , दुनिया बहुत जालिम है वेतन स्थान पर कमरे में बंद कर के पिटाई की संस्था संचालकों ने, कितना गलत किया बेचारे के साथ। मित्र को देखा तो जाना सचमुच पिटाई तो हुई थी , पूछा तो फिर से वही ‘जालिम दुनिया गंदे लोग’ अध्याय शुरू हो गया. बोला वो उन सब से बदला जरुर लेगा ।
मैं वहाँ से वापस घर आया तो देखा एक सज्जन मेरी प्रतीक्षा में थे , पता लगा की ये उसी संचालक समिति के सदस्य है जिन्होंने मित्र को धोया था, क्रोध में जलती आँखों से मैंने उन्हें घूरा। पर घर आए अतिथि से अशिष्टता करना हमारी संस्कृति नहीं इसलिए शांत रहकर उनके आने का प्रयोजन पूछा तो वो कहने लगे की, ‘आपके मित्र ने एस सी / एस टी का केस किया है हम पर , आप को गवाह बनाया है , क्या आप ने हमे आपके मित्र को , उसे ही क्यूँ किसी को भी कोई गाली देते हुए देखा है ? ये भी छोडिए क्या आप आज से पहले मुझसे मिले भी हैं ?’
एक क्षण रुक कर विचार किया फिर मैंने कहा ,’ जी मानता हूँ कि मैं आज से पहले आप से कभी नहीं मिला , फिर कभी कुछ गलत कहते देखने का प्रश्न ही नहीं, यहाँ तक कि मुझे ये भी आप ही से पता लग रहा कि मैं कोई गवाही देने वाला हूँ , सरासर झूठी, पर जब आप किसी निरीह को इस प्रकार प्रताड़ित करेंगे तो वो बेचारा इससे अलग कुछ करेगा भी क्या , आपने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा पर मेरे मित्र का तो बिगाड़ा है, न्याय का तकाजा है कि आप भी अपनी करनी का दंड भुगतें।‘
वो सज्जन मुस्कुराए बोले , ‘आपके मित्र वेतन को लेकर जो आरोप गढ़ रहे हैं क्या आपको वो सत्य प्रतीत हो रहे हैं ? एकाउंट चेक कीजिए उनका कि हर महीने की पहली तारीख को वेतन जमा हुआ है या नहीं , आप कुछ नहीं जानते आपके मित्र की सज्जनता के विषय में , हम भी नहीं जानते थे वरना शायद सच में हम उसकी पिटाई करते ।’
‘मतलब आपने उसे नहीं मारा , तो वो निशान क्या उसने खुद बना लिए अपने चेहरे पर , पूरे शरीर पर घसीटने और लात घूसों के निशान हैं , कई जगह से शरीर नीला हो गया है , सब उसने खुद किया है ?’
‘अरे साहब, उसे हमने नहीं उन बच्चियों के परिजनों ने मारा जिनके साथ आपका मित्र अश्लील हरकतें करता था, कम्प्यूटर शिक्षण की आड़ लेकर बच्चियों को ‘नीला जहर’ परोस रहा था, शायद ४-५ साल की मासूम बच्चियां कुछ न भी कहती पर बड़ी बच्चियों पर भी हाथ आजमाना महंगा पड़ गया। आपसे पूछता हूँ आपके घर की कोई कन्या के साथ ऐसा होता तो आप क्या करते ? गुस्सा आता न , उनको भी आ गया। हर गलती कीमत मांगती है साहब , आपके मित्र ने वही चुकाई है, आपसे यही कहने आया हूँ कि गलत का साथ मत दीजिए. अगर आप को मेरी किसी बात पर अविश्वास हो तो मैं आपको उन बच्चियों से भी मिलवा दूंगा .’
***
कुछ समय बाद एक मित्र घर पधारे तो बातों बातों में ‘उस’ मित्र का जिक्र आया , वो हंसते हुए बोले कि , ‘सुना है कि आजकल वो ये कहते घूम रहे हैं कि तुम बिक गए हो , तुमने स्कूल वालों से पैसे ले लिए , धोखेबाज़ हो, उसका फायदा उठाया वगैरह वगैरह ‘ कहते कहते जोर का ठहाका लगा दिया. मैं सोचने लगा शायद मुझे अभी बहुत सीखने की जरूरत है .
***
जीवन ढेरों खट्टे मीठे अनुभव देने वाली अनूठी पाठशाला है , एक बार अजीत ने मुझसे कहा था कि इन्सान जैसा खुद होता है, दूसरों में भी वही सब नजर आता है, सब कहते हैं फेसबुक आभासी दुनिया हैं पर सौभाग्य से यहाँ वास्तविक दुनिया से अधिक वास्तविक लोग मिले हैं शायद इसलिए क्यूंकि यहाँ पर इन्सान की तलाश उसके स्वार्थ से जुडी होती है, शायद जिसे जो चाहिए वो उसी की और आकर्षित होता चला जाता है, एक बार कहा भी था कि ‘होगी ये आभासी दुनिया , पर कुछ लोग है जो अपनों से अधिक अपने लगते हैं।’ इसी आभासी दुनिया ने मुझे उस ‘गुरुकुल’ का अंग भी बनाया है जो अधिकांश के लिए कुतुहल की वस्तु है। सीखना तो आजीवन चलता ही रहेगा, पर ये आभासी अनुभव भी बहुत अद्भुत हैं, सच्ची ....
#जयश्रीकृष्ण
rajpurohit-arun.blogspot.com
अरुण

💓💔💕💞❣💤 पार्टी ऑल नाईट ♠♠♠♠♠ .


'सुण सरदार अब भी सोच ले यार, गुरुजी ने ठा लाग गयो तो आपां दोनुआँ ने धोवेला'

"अबे कित्ती बार बोला है कि अपनी मारवाड़ी मत झाड़ा कर फ़ोकट में , सब ऊपर से गई मेरे😣"

'यार मैं तो बस इतना कह रहा हूँ कि गुरुजी को पता लग गया तो....'

"कुछ नहीं होगा, हम हैं तो क्या गम हैं...." कह कर सरदार , मेरा मतलब हमारे शुक्ल ने हमको गुरुकुल की दीवार से बाहर की और धक्का दे दिया ....धम्म से मैं बाहर गिरा वो तो किस्मत अच्छी थी कि मिट्टी थी उधर, उठ कर कपड़े झाड़े, तभी एक बैग भी बाहर की और फेंक दिया। पता नहीं ये संयोग था या साजिश की बैग भी मुझसे ही आकर टकराया, मन ही मन मैंने सरदार को अच्छी अच्छी गालियाँ दी, जी मन ही मन क्योंकि अगले ही पल सरदार की खोपड़ी ने दीवार के ऊपर से झाँका फिर होल बॉडी तुपुक करके इस और टपक गई।

आते ही बोला , "देखा बे, कित्ता आसान है सब.."

'यार पर गुरुजी को....'

वाक्य पूरा करने से पहले टोक देना सरदार को सबसे ज्यादा पसंद है, टोक कर बोले , "यार तुम इतने फट्टू काहे हो बे, बताया तो है कि गुरुजी सोय रहे टनाटन,  सुबह तक उनके उठने से पहले लौट आएंगे दोनों, डिस्को फिस्को देख लो प्यारे , गुरुकुल में सब गियान मिलेगा पर हम जो गियान देंगे वो किसी के पास नहीं मिलेगा"

मैं बस श्रद्धा से सुकुल को निहार रहा था।

"अबे ऐसे काए देखते हो बे?"

'यार गुरु, फिर ये बैग..?'

"गुरुजी ठीक कहते हो गंवार ही रहोगे तुम, अबे ये लुँगी लपेट के डिस्को में जाओगे ? कपड़ा लाए है बे, दोनों के लिए, एकदम टिपटॉप, पता भी है ड्रेसकोड चलता है उधर ...इस लुँगी में तो डिस्को के पास से न गुजरने देंगे अंदर घुसने की तो भूल जाओ, चल जल्दी रेडी हो जाओ"

'रेडी ? क्या यार कपड़ा पहनने में कितना वक्त लगेगा'

"नहीं लगेगा, पर लाली लिपस्टिक में तो लगेगा न, अब देख आँखे बड़ी मत कर, वरना मुक्का मार देंगे बताय रहे, इतनी मुश्किल से बाहर आए, अब नखरे मत करना, उधर लड़की के बिना नहीं जाने देते, काश अपने गुरुकुल में भी कन्याएँ होतीं।" कहकर सरदार सपने से देखने लगा।

'तो तुम इसलिए मुझे साथ लाए, यार ये गलत है सच्ची....'😢

****

बड़ा ऑकवर्ड फील हो रहा था, अपनी ही लिपस्टिक की बास होंठो सेनथुनों में जा रही थी,पता नहीं लड़कियाँ रोज कैसे ये रगड़ती हैं होंठो पर,  मैं चुपचाप सकुचाई आई मीन सकुचाया सा एक टेबल पर बैठी अबे मेरा मतलब बैठा हूँ यार (कमबख्त वेश बदलते ही छोरियों वाली फीलिंग आने लगी है खुद से 😢)। चारों और जगमगाती लाइटिंग, दमकते चेहरे, धुआँ धुआँ जिंदगी, बहकते कदम, मचलती जवानी, उफनता शबाब और उठती गिरती स्वर लहरियों पर थिरकते बदन, सरदार मुझे छोड़ कर डिस्को कर रही कमसिन कन्याओं पर डोरे डाल रहा, हुँह सनम हरजाई... मुझ अबला को अकेला छोड़ कर जाते तनिक लाज भी न आई तुमको, न जाने क्यों एक अनजान हया चेहरे की लाली में घुल गई, हुरर्र हुर्रर ये मेरे अंदर महिला कैसे घुस गई, कंट्रोल अरुण कंट्रोल..... सहसा पीछे से एक हाथ कंधे पर रखा किसी ने, मैं घबरा कर मर ही जाती अगर पलटते ही वो न दिखाई दी होती। सामने एक 18-19 वर्षीय ज्ञातयौवना नशे में झूमते अपने समस्त उफान को थामे खड़ी थी। धीमे धीमे झपकती पलकों के बीच मुझे देख मुस्कुराई, बोली "हाई बेबी, अकेली क्यों बैठी हो हिच्च, कोई सआथ नहीं अआया"।

सच कहूँ आज पहली बार सुकुल को पीट देने का मन कर रहा था, कुछ बोला न गया बस डांस फ्लोर पर उछलते सुकुल की और देखा फिर बिना कुछ बोले नज़रें झुका ली।

"Awwwwwweee my babyyyy.." बोल कर वो मेरे पास आई aww के साथ गोल हुए होंठो की छाप मेरे गाल पर लगाते हुए बोली, "ये जओ बंदर की तरह कूद रहा वओ तुम-हारे सआथ है ?" मैंने बिना कुछ कहे यंत्रवत हाँ में सिर हिला दिया।

"कम ऑन लेट्स डांस डार्लिंग..." एक साथ कई भाव मेरे चेहरे पर आ-जा रहे थे, और विग के नीचे छुपे मारवाड़ी तरबूज से मैं समझने की कोशिश कर रहा था कि आखिर माजरा क्या है? थोड़ा असहज हो रहा था, तब भी जब उसने पास आकर गले से लगा लिया, फिर अपनी बाहों की पकड़ मजबूत करते हुए बोली ,"प्लीज इट्स माय बर्थडे.." सोच रहा था कि लड़कियाँ गले लगती हैं तो कितनी मस्त वाली फीलिंग आती है न, सुकुल भगवान तेरा भला करे पर मैं तुझे छोडूंगा नहीं कमीने, ये न जाने क्या समझ के गले लग रही, अबे हाँ ये मेरे गले लग ही क्यों रही , लड़की लोग का आपस मे ये सब भी चलता है क्या ? सोच ही रहा था कि वो हाथ पकड़ कर मुझे भी डांस फ्लोर पर खींच लाई, बाय गॉड इतना कोई असली लड़की भी न शरमाई होगी जितना मैं शर्मा रहा था। लड़की के साथ लड़की डांस क्यों करे भला, अजीब लग रहा था, इधर उधर देखा, लगा सरदार को छोड़ हर कोई बस मुझे ही देख रहा, वाकई बंदर लग रहा था सरदार हाथ आगे पीछे कर कर के उछल रहा था। मुझे डिस्को में अंदर घुसने के टोकन की तरह यूज करके अब वो अपनी ही धुन में मग्न था। सबकी... बजाते रहो....सबकी ...बजाते रहो...

लड़की अपने हाथ मेरे कंधों पर टिकाए अपनी अलग मस्ती में थी, झूम रही थी,एक  बार टेंडर सरदारजी भी थे, जो न जाने क्यों इधर ही नजरें गड़ाए हुए थे, साले कभी खूबसूरत लड़की नहीं देखी क्या, गुस्सा आ रहा था, जलती आंखों से उसे देखा फिर मैंने सोचा अबे कुछ और दिख तो नहीं रहा, अपने कपड़े ठीक किए , फिर से सोचा कर क्या रहा हूँ मैं इधर, घण्टा नाचना आता है मुझे, ऊपर से बॉल उछलने का डर है सो अलग। वापस लौटने को हुआ तो लड़की ने पकड़ कर वापस खींच लिया अपनी तरफ। सोचा, यार ये किस तरह की लड़की है?

सोच ही रह था कि वो बोल पड़ी फिर से, "यू डओंथ लाआइक डआंस..ओके चअल उधर बैठते हैं" मैं संकुचाते हुए आवाज़ को यथासम्भव पतला करके बोला, 'वो मेरा दोस्त....'  पर ये भी सरदार जैसी ही निकली मेरी बात पूरी होने से पहले ही बोल पड़ी, " तुम्हआरा बंदर उछल्ल रहा आरआम से, अआओ हम्म्म तुम्म्म बैठते है यआर"

'इतना क्यों पीती हो, बोला भी नहीं जा रहा ढंग से' मैंने कहा। उसने अपनी नशीली आँखे मेरी आँखों मे गड़ा दी, हालांकि मैंने फिर से लड़की की आवाज़ में ही बोलने की भरपूर कोशिश की थी, तो क्या उसे शक हो गया था ? क्या इसे पता लग गया था कि जिसे ये बार बार हनी बोल कर चिपक रही वो हनी नहीं वास्तव में हनुमान है? अचानक वो मुस्कुरा दी फिर गाने लगी, ओ मउझे पपीने का शोंक नहीईं पी ती हूँ गम भुलाने को, कह कर वो मेरी बाहों में झूल गई। झूलते झूलते कहने लगी, "यआर तुम्म्म भी अकेली मैं भी अकेली , हम्म तुम्म्म संग हैं तो फिर क्यआ गम्म , रआजा को रआनी से प्यार, नहीं प्यार नहीं , कोई रआजा भी नहीं, ओनली रआनी, रानी को रआनी से प्यार हओ गयआ हिच्च।"

'सम्भालो अपने आप को, कहीं गिर न जाओ'

"अरे हम्म तओ हैं गिरे हुए यआर,हैं हम्म,  पर प्लीज कम से कम्म तुम्म्म तो मअत बोलो, सबकी तरह"

'आओ उधर ही बैठते हैं अकेले में'

"नाईं मुझे जाआना है अब"

'घर?'

"गाआड़ी तक छओड़ दोगी प्लीज"

'ओके चलो छोड़ देती हूं'

वो अपने शरीर लगभग पूरा भार मुझ पर डाले, मेरी बाहों में झूलती सी साथ चल रही थी, बदन से महकते इत्र की खुशबू में मुँह से भभकती शराब की दुर्गंध मिल कर एक नई अजीब सी तीखी गंध बना रही थी। उसकी गाड़ी में उसे बिठा कर लौटने लगा तो फिर से हाथ पकड़ लिया, "बैठो न पलिज्ज ,यहाँ तो कओई नहीं , बआत करओ न मुझअसे पलिज्ज, कओइ नहीं करता , वओ भी नहीं"

मैं गाड़ी की अगली सीट पर उसके पास बैठ गया। पूछा ,'ड्राइव कर लोगी इस हालत में ?'

"कर लूंगी यआर, नहीं तो क्याआ हओगा, हिच्च, मर ई तओ जाऊंगी न ज्यादा से ज्यादा"

'दुखी हो इसलिए पी है इतनी ?'

"वओ साआला कुत्ता, उसको लगता है, मेरा चक्कर है कओई और के सआथ, साआला खुद के जैएसे समअझ रखा है क्याआ, कओइ नहीं चाहिए, भाआड़ में जा कुत्र्या, नहींइं चैये कोई तू भी नाईं। मेरी दऔसत है सआथ मेरे, हो न तउम मेरे साथ ?" कह कर उसने मेरी और डबडबाई आंखों से देखा, कार के भीतर मद्धिम प्रकाश के बीच पहली बार ढंग से उसका चेहरा देखा। भोले से चेहरे पर काजल की रेखाएँ दिख रही थी, वो मेरे करीब आई और मुझे इतनी जोर से गले से लगा लिया कि अपनी ही 'कोस्को' बॉल सीने पर चुभने जैसी लगने लगी। "मुउझे छोड़ कर मअत जाना कभी"

'पर तुम मुझे गलत समझ रही हो, मैं वो नहीं हूँ जो तुम समझ रही हो' वो मुझे विस्मय से बस घूर रही थी, मैंने आगे कहा,' मैं लड़का हूँ ' कहते हुए अपना विग उतार दिया।

"सआले सअब एक जैसे, तू भी धोखेबाज़ निकली..."

'पर मेरी बात तो सुनो.....'

उसने कस के लात मारी धड़ाम से मैं कार से बाहर आ गिरा।

उठा, देखा तो कार नहीं थी, सब कुछ गायब, पास में मेरी चारपाई उल्टी पड़ी थी, अजीत चिल्ला रहा था, "सुनते नहीं हो इसलिए चारपाई उलट दिए हैं, गुरुजी बुलाय रहे"

अजीत यार आज अच्छा नहीं किया तुमने, कम से कम लड़की को पूरी बात तो बताने देते, उठ कर कपड़े झाड़े, सुकुल कुवें के पास खड़ा ज़ोर ज़ोर से दांतों पर नीम का दातुन रगड़ रहा था। मुझे देख कर मुस्कुराया तो मैं भी हँस दिया, फिर मन ही मन कहा,'बंदर कहीं के ' 😊😊😊



#जयश्रीकृष्ण

अरुण

Rajpurohit-arun.blogspot.com


🙏🙏🙏🙏🙏 नमस्तस्ये गुरवे नमः ♠♠♠♠♠ .


राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय सादुलशहर, बोले तो बड़ा स्कूल, इसे बड़ा क्यों कहते हैं पता नहीं, शायद इसलिए क्योंकि ये वाकई काफी बड़ा ही है आकार में, इसे देख कर सहसा किसी के मुँह निकला होगा," हम्म ...बड़ा तो है " और किसी ने सुन लिया होगा और बस भेड़चाल शुरू हो गई होगी, बड़ा स्कूल-बड़ा स्कूल पुकारने की और यूँ ही यही नाम भी पड़ गया होगा। या शायद शहर के बाकी स्कूलों से उम्र में सबसे बड़ा होने के चलते इसे ये नाम मिला हो , हाँ जी शहर का सबसे पुराना स्कूल खोजने निकले तो यहीं आना पड़ेगा , अपने जमाने मे इलाके का इकलौता उच्च माध्यमिक विद्यातय यही था तब शायद यहाँ पढ़कर गए किसी बुढऊ ने ज्ञान पेला हो कि बेटा हम तो बड़े स्कूल में पढ़ते थे एंड यू नो फिर से किसी ने कुत्ते की बॉल की तरह लपक कर नामकरण कर डाला हो, या फिर शायद किसी महान ज्योतिषी ने कोई भविष्यवाणी कर दी होगी कि एक समय वो भी आएगा जब मेरे कदम इस विद्यालय के धरातल को पवित्र करेंगे , और मैं किसी छोटे मोटे स्कूल में तो पढ़ने से रहा ? तो बस उसी भय से स्कूल को बड़ा घोषित करवा दिया गया हो।

  बहरहाल, कारण चाहे जो हो पर जब मैंने इस विद्यालय के बारे में प्रथम बार सुना तो यही सुना कि कोई बड़ा स्कूल है जो मेरे आगमन की बेसब्री से बाट जोह रहा है और आखिर प्रभु कृपा हुई ,सृष्टि खिल उठी , कलियां मुस्कुराने लगी ,कोयल गाने लगी 8 वीं क्लास पार करके हम इस बड़े स्कूल में जो आ पहुंचे थे , अब चूंकि स्कूल बड़ा था चाहे जिस भी वजह से हो पर था और चाहे मैं खुद को वहम में डाल कर आपको भ्रमित करने के भी कितने ही प्रयास करूँ पर मुझ जैसे चूजे की कोई वैल्यू इच नहीं थी उधर , दाढ़ी मूंछ वाले मुस्टंडों की भरमार हो रखी थी जी , चूजा ही तो लगूँगा उनके सामने, हाँ नहीं तो , इतनी भीड़ कि 9 वीं के सेक्शन 'ए' से शुरू होकर कब 'ई' तक चले गए किसी को कोई पता न चला , मुझे मिला 'सी' हाँ जी 9 वीं सी, पता नहीं किस महान आत्मा ने इस क्लास में एडमिशन किए थे, पूरे शहर के लुच्चे ,बच्चे नहीं कहूँगा क्योंकि किसी भी एंगल से वो बच्चे तो नहीं ही काहे जा सकते, ठूस ठूस कर भर दिए (प्लीज मुझे लुच्चा समझने की भूल न करना, माता रानी पाप लगाएगी , बोल देता हूँ हाँ) धनिया, महेनदिया, प्रेमिया, देबीलाल, महाबलौ, कालिया और बाबू राम ढाई टांग वाला जैसी दिव्यात्माओं से प्रथम बार साक्षात होने का अवसर यहीं प्राप्त हुआ।

क्लास में अपने नाम को चरितार्थ करते हुए प्रायः  'सी' ग्रेड फिल्मों की तरह सी सी की आवाज़ें हुआ करती, इसी महान कक्षा में हमने ये जाना की अपने निजी अंगों का सावर्जनिक प्रदर्शन करने वाले आखिर कैसे दिखते हैं, कबहु न स्मरणीय नित्य दुत्कारणीय श्री कालिया जी अपनी इस सिद्धहस्तता का डेमो पब्लिक डिमांड के अनुसार दिया करते. श्री भोगीराम जी वर्मा हमारे कक्षाध्यापक नियुक्त हुए , अब इसे संयोग कहूँ या मेरा सौभाग्य कि ये भी अपने नामानुरूप गुणधारक थे, बच्चों से छाछ से लेकर कुछ भी मंगवाने या लेकर भोग करने में कोई संकोच करना उन्हें पाप प्रतीत होता । सामाजिक के अध्यापक थे और हमें सामाजिक नहीं पढ़ाते थे , अक्सर क्लास के मुच्छड़ छात्र हाजिरी की औपचारिकता होते ही क्लास की इकलौती खिड़की , जिस बेचारी अबला का सब लूट कर उसे सरिया विहीन, लज्जाहीन बना कर मुँह बाए पड़े रहने वाली बना दिया गया था, का सदुपयोग करते हुए क्लास से कल्टी मार लेते. प्रिंसिपल कभी कभी आते 11 बजे वाली ट्रेन से आकर 2 बजे लौट जाते , लेकिन स्टॉफ सदस्यों को विद्यालय में पूर्णतः शांति व्यवस्था बनाए रखने के 'गुड गुड' कह कर कॉम्प्लिमेंट देना न भूलते. अब स्कूल में कोई बच्चा हो तो ही तो शोर हो। बड़े स्कूल की बड़ी बड़ी बातें 😊

ज्यादातर अध्यापक स्टॉफ चैस और ताश  खेलने में प्रवीण थे , विद्यालय समय में होने वाले सम्बंधित खेलों के आईपीएल सरीखे मैचों में अपनी इस कला का मुजाहिरा भी किया करते । बेचारी अध्यापिकाएं जो न जाने किस अज्ञात शर्म से उन सब का साथ न दे पाती अक्सर क्रोशिए या  सलाई पर सलाई चढा कर दे दना दन टाइप अपना गुस्सा उतारती दिखाई पड़ती।

 कम ऑन अब आप कहीं ये तो नही सोच रहे न कि मैं बस सबकी बुराई ही किए जा रहा हूँ ? ना जी , बड़ाई किए देता हूँ, अबी के अबी, एक हमारे अंग्रेजी के अध्यापक थे एक्सप्रेस सर, एक्सप्रेस इसलिए क्योंकि चलने से लेकर पढ़ाने तक , सबकी गति में किसी एक्सप्रेस ट्रेन की सी तेज़ी थी,  वो चलते हुए आते हमे लगता दौड़ते हुए आ रहे हैं , आते ही बिना कुछ कहे ब्लैक बोर्ड पर एक साथ 3-4 प्रार्थना पत्र, 2-3 लेख, 5-6 कहानियाँ अंग्रेजी में छाप देते , अवाक से हम उनकी गति पर आश्चर्य करते हुए बोर्ड के पास जाकर कुछ समझ के साथ लिख लेने का प्रयास करते, गुरुजी जाने क्यों इससे चिढ़ जाते, अबे अंधे हो क्या कह कर ऐसा हाथ घुमाते उसके बाद अगले 10 मिनट चेतना शून्यता में गुजरते, फिर जब संवेदना लौटती तो आँखों को दूरदर्शी बनाकर पढ़ने की विद्या न जाने कहाँ से प्राप्त हो जाती . गुरुजी की जय हो।

 जाने कैसे सब कल्लू कल्लन कालिया को पीछे छोड़ 11 वीं कक्षा में पहुंच गए तो श्री संजय शर्मा जी से परिचय हुआ , हमारे हिंदी सेक्शन के कक्षा और विषयाध्यापक , सब पर स्नेह बरसाने वाला मुस्कुराता चेहरा और अलौकिक व्यक्तित्व, विषय पर पकड़ इतनी की अपनी पहली ही कक्षा में रट कर याद करने वाले हम जैसो को समझ कर समझना समझा दिया, कभी याद नहीं पड़ता कि कभी किसी को मारा होगा। काव्य हो या गद्य उसे पढ़ते समय वैसा ही रसमय हो जाना उनसे सीखा, हर पेज पर डेढ़ दर्जन गलतियों पर गोले देख मुँह उतर जाता पर जब वो गोले धीरे धीरे एक एक कर कम होते गए तो सब असंतोष जाता रहा। स्व. श्री वंशीधर जी जब इतिहास पढ़ाया करते तो लगता मानो समय रुक ही नहीं बल्कि पीछे चला गया है और हम इतिहास को प्रत्यक्ष अपनी आंखों के सामने घटता देख पा रहे हो,वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक लिखे जाने लगते, बुद्ध जीवित हो उठते, कलिंग युद्ध में अशोक के मन की पीड़ा पीड़ितों का चीत्कार जो शब्दों से प्रत्यक्ष कर दे वो गुरु सच मे विलक्षण ही थे। इतिहास को मात्र घटनाओं के विवरण की तरह न पढ़कर उन से सीख लेकर पढ़ने की सीख उनसे मिली।  12 वीं का जब रिजल्ट आया तो हिंदी वर्ग में मैं तहसील टॉपर था , अपने इन्हीं महान गुरुजनों के कारण , जब अंक तालिका लेने गया तो बंशीधर सर ने प्यार से सर पर हाथ रखा था, उनकी वो आँखें आज भी याद है मुझे।

***

कहीं पढ़ा था ,थॉमस अल्वा एडिसन जब बल्ब बना रहा था तो निन्यानवे बार उसका प्रयोग असफल रहा, पर वो निराश नहीं हुआ, जब उससे पूछा गया तो उसने कहा कि मैंने 99 ऐसे तरीके खोज निकाले हैं जिनसे आप चाहो तब भी बल्ब नहीं बना सकते, आज बल्ब सहित अनेकों अविष्कार करने वाले एडिसन को सब सम्मान से याद करते हैं।

मित्रो, शिक्षण तो जीवन भर अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है, हम एक शिशु के रूप में जन्म से लेकर अब तक लगातार कुछ न कुछ सीखते ही आए हैं, माता पिता, मित्र, बन्धुजनों से लेकर जीवन के प्रत्येक अच्छे व बुरे अनुभव हमें कुछ न कुछ सिखाते हैं , ऊपर कुछ ऐसा विवरण लिखा है जो शायद मुझे किसी गुरु के लिए नहीं लिखना चाहिए (इसलिए सादर नाम परिवर्तित कर दिए हैं), पर जीवन में सिर्फ अच्छा ही नहीं होता, मैं किसी को सर्टिफिकेट देने वाला कोई नहीं पर बुराई को बुराई के रूप में स्वीकार करना हमें आना ही नहीं चाहिए, वरना अच्छाई मूल्यहीन हो जाएगी। मेरे जीवन में आकर अच्छा बुरा प्रत्येक, कुछ भी मुझे सिखाने वाले हर गुरुजन को हृदय से धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। शिक्षक दिवस की अनेकानेक शुभकामनाएँ। नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः .......

#जयश्रीकृष्ण

अरुण

Rajpurohit-arun.blogspot.com

🛀🚽🎭👙💦 शरीफ ♠♠♠♠♠ .


वक़्त दिन के 1 बजे , शास्त्री बॉयज होस्टल के एक कमरे में जीन्स को खुद ही काट कर बनाई गई स्पेशल कैप्री और भूरे रंग की टी शर्ट पहने एक लड़का अपनी चारपाई पर औंधे मुँह लेट कर ऊंघ रहा है ,नींद आंखों से कोसों दूर है, ऊपर भूरे रंग का खेतान पंखा अपनी ब्रांड वेल्यू बचाने की जुगत में तेज चलने की कोशिश में हांफ रहा है, लगता है सालों से ग्रीस दिखाया भी नहीं बेचारे को, हर चक्कर के साथ बेयरिंग से छोटी पर तीखी 'कीं' की दर्दभरी ध्वनि निकलती है जो मोटर के दबाव में 'कीं कीं कीं कीं' का कर्णकटु शोर बन चुका है, पर इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा। जूठे बर्तन अब भी किसी धोने वाले की राह मुँह फाड़े ताक रहे हैं की जाने उन्हें धोने वाला उनका उद्धारक भागीरथ कब आएगा। चारपाई के पास बनी आलमारी में कुछ किताबें बेतरतीब बिखरी पड़ी है, वहीं पास पड़े रेडियो पर सूरतगढ़ के कॉटन सिटी चैनल से 'फौजी भाइयों के किसी फरमाइशी गीतों का कार्यक्रम' का प्रसारण हो रहा है, उद्घोषक गाने से पहले कई फौजियों के नाम गिना रहा है पर लड़के को वो सब जानने या सुनने में कोई इंटरस्ट नहीं , गर्मी बहुत है न, गाना शुरू हुआ 'धक धक करने लगा' गाने की उठती गिरती स्वर लहरियों के साथ ऊंघते ऊंघते लड़के के मन में कुछ काल्पनिक चित्र उभर रहे हैं, एकाग्रता बढ़ाने के लिए लड़के ने अपने ध्यान में आ रहे चित्रों को अपने मन से रंग देना शुरू कर दिया, अब ये चित्र उसे कुछ सहपाठी लड़कियों का आभास करवा रहे , धकधक गाने के साथ चित्रों के विशिष्ट उभार एक थिरकन पर नाच रहे लगते हैं, यहाँ तक कि लड़के के स्नायु में रक्त का प्रवाह भी उसी आरोह अवरोह से बह रहा है, लड़के की आंखे बंद है, कल्पनाएँ और जवां होने को है पर चित्रों का चीर हरण होने से बच गया , दरवाजा जो बस यूं ही दिखावटी बन्द था उसे खोल एक अन्य लड़का भीतर दाखिल हुआ।

दूसरा लड़का भी पहले लड़के की ही आयु वर्ग का है मने यही कोई 17-18 साल, कपड़ो के नाम पर सिर्फ बनियान और तौलिया लपेटे, सांस धौंकनी की तरह तेज़ चल रही है तो पसीने से चेहरा गीला और बनियान तर नजर आती है , आते ही बेफिक्री से अपनी अलग चारपाई पर पसर गया, उसके लेटते ही चारपाई के मुँह से चर्ररर वाली गाली निकली फिर उसने भी चद्दर के साथ खामोश गुफ्तगू शुरू कर दी,दूसरे लड़के के  हाथ मे पंजाब केसरी का रविवारीय चिकना रंगीन बॉलीवुड पृष्ठ है , उसी से कुछ पसीना सुखाने की कोशिश करने लगा, कुछ आराम की लंबी साँसे भीतर खींची, फूं-फूं, फूं-फूं, पहला लड़का अपनी कल्पनाओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर ही रहा था कि दूसरा बोला,'यार पिंटू ये माधुरी भी मस्त थी अपने टाइम में , हैं ना? पता है ये मेरा पहला प्यार थी 9 th क्लास वाला, धिक ताना धिक ताना धिक ताना' फिर पिंटू के जवाब की प्रतीक्षा किए बिना फिर कहने लगा,'पर उफ़्फ़ ये आयशा टाकिया, ये तो कयामत है कयामत, कलेजा निकाल लिया इसने तो'

पिंटू ने नजरें उठा कर देखा, और गुस्से से बोला,'साले शक्ति कपूर, कब से अखबार ढूंढ रहा था तो ये तू ले कर 1 घण्टे से  गुसलखाने में घुसा बैठा था न?  पढ़ तो लेने देता , किसी दिन वहीं हांफते हांफते मर जाएगा कुत्ते और मैं तुझे वहीं जला आऊंगा उस अखबार के साथ'

शक्ति कपूर आई मीन शरद ने पिंटू यानी पुलकित के गुस्से को बहुत कैजुअल सी हंसी में उड़ा दिया, हँसते हँसते ही बोला,'तुझे पता है आयशा आज फिर से किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रही खीखीखी राम तेरी गंगा मैली कर डाली' फिर अखबार में छपी एक सिने तारिका के चित्र को चूम लिया। फिर बोला,' यार सच में ये तो गार्डर है गार्डर, ओये आयशा ऐसे ना देखा करो यार , आई लव यू सच्ची मुची, तुम्हारे पापा की कसम'

अचानक किसी की फरमाइश से रेडियो पर कोई देशभक्ति गीत बज उठा है,'ए वतन वतन हमको तेरी कसम...' शरद ने मुँह फेर लिया और अपनी आयशा के बगल में लेट गया, चारपाई की एक और आह चरर्रर करके निकली , इधर गीत का मुखड़ा खत्म होने से पहले ही पुलकित ने रेडियो के जरिए मो. रफी का गला घोंट दिया, रफी साहब की आवाज बिना किसी तड़प के खामोश हो गई. बिखरी किताबों के ढेर के ठीक नीचे से एक विदेशी अंग्रेजी पत्रिका निकाल ली पुलकित ने ,जिस पर उकेरी विभिन्न मुद्राओं और भाव भंगिमाओं वाली विवस्त्र नायिकाओं के अंगों को निहारते हुए स्वयं को उनके नायक पद पर प्रतिष्ठित कर काल्पनिक रति के असीम सागर में गोते लगाने लगा.

****

'अबे तुझे पता है तेरी टेंशन क्या है ? साले दिमाग में लड़कियाँ घूमती है तेरे भले ही तू किताबें उठा के बैठा रह, घण्टा सेलेक्शन होगा, ये पकड़ मेरा....., 2 साल हो गए पीएमटी के नाम पर झक मारते हुए क्या मिला बता......'

'यार तेरा दिमाग खराब है, बहुत लोगों का सेलेक्शन नहीं हुआ इसका मतलब सबके फेलियर की वजह लड़कियां है ?'

'सबका कौन कह रहा बे लो$, पर ज्यादातर की वजह यही है, भेंचो दिमाग में गर्मी चढ़ी है सबके, तो दिमाग ठिकाने पे कैसे होगा , पता है अंग्रेज लोग इत्ती तरक्की क्यों कर रहे ? क्योंकि साले वो गर्मी निकाल देते है तरीके से, फिर फुल्ल कन्सन्ट्रेशन से करते हैं हर काम , और रिजल्ट देख ले, हम लोग सोने की चिड़िया का झुनझुना बजाते रह गए और वो साले पता नहीं क्या क्या बना कर बैठे है, दुनिया भर के अविष्कार कर डाले, और हम लोग भेंचो बस लौ@ पकड़ के बैठे रहेंगे '

'यार दिमाग मत खा प्लीज, मुझे पढ़ने दे ....'

'अबे मेरी मान कोई लड़की मिले तो लड़की वो न मिले तो न सही तो फिर कोई आंटी ही पटा ले, अपणे को क्या है अपणे को तो बस पाणी निकालना है'

'तू जा न मेरे बाप'

'अच्छा जा रहा हूँ भाई, पढ़ पढ़ तू तो पढ़ जी भर के'  शरद ये कह कर हँसते हुए अनिकेत यानी अनु के कमरे से बाहर आ गया. जैसा इन दोनों की बातचीत से भी पता लग रहा है अनु मेधावी मेडिकल स्टूडेंट था पर साथ ही साथ जो प्री मेडिकल टेस्ट में दो साल से फैल भी हो रहा था , शरद इसे उसकी एकाग्रता में कमी का परिणाम मानते हुए उसे एकाग्रता प्राप्त करने का गुरु मन्त्र दे रहा था. और जिसे अनिकेत अस्वीकार कर रहा था.

शरद अपने कमरे में आया तो देखा तो खेतान की किलकारी चालू थी और पुलकित बत्ती वाला स्टोव जला कर दाल को तड़का लगाने के लिए घी गर्म कर रहा था, उसे देखते ही चिल्लाया ,'भोपडी के ,प्याज काट फटाफट,और लहसुन भी छील जल्दी से, मुझे तेरा टकला बाप तनख़्वाह नहीं देता तुझे बना बना के खिलाने की, कहाँ मुँह मार के आ रहा है ?'

'कहीं नहीं बे, अनु के पास ही तो था, समझा रहा था उसे , सेलेक्शन प्रॉसिजर स्टेप बाय स्टेप'

'तू रहने दे बे क्यों बेचारे शरीफ लौंडे को बिगाड़ रहा है, बेचारे पर तरस आता है मुझे तो, उस दिन का याद हैं ना ये रोज किताब हाथ में ले के सो जाता था, जब भी बोलो तो कहता मन मन में पढ़ रहा था उस दिन मानना ही पड़ा इसे'

'हाँ तो , उससे क्या हुआ..?'

'ओहो, घण्टा, साले सब्र कर लिया कर ....बता तो रहा हूँ, तो उस दिन इसी ने बोला की अब अगर मैं सो जाऊं तो एक मुक्का मार देना, तब से इसे दस मुक्के मार चुका हूँ ,आज भी ये सो गया था, क्या कस्स के मुक्का मारा मैंने,  मजा ही आ गया, पर बाद में अफसोस भी हुआ फिर से'

'चल चल तू दाल को तड़का लगा, ज्यादा चगल मत मार'

*****

'अबे इसका पहली बार है, शरीफ लौंडा है, कोई ढंग का माल हो तो ही बता'

'अरे आप चलो तो सही , ए वन पीस मिलेगा, धंधे की कसम मजा न आए तो एक पैसा मत देना आप'

'देख कोई देख ना ले, साला पुलिस का टँटा नहीं होना चाहिए, ये सब झंझट से बहुत डर लगता है हम लोग को,भेंचो इज्जत का फालूदा हुआ तो साले मार मार के भुर्ता बना दूंगा मैं तेरा'

'अरे आप चिंता न करो, आप को मरवा के कहाँ जाएंगे, धंधा थोड़े न चौपट करना है'

शरद किसी कुर्ते पायजामे वाले मरियल से दढ़ियल से बात कर रहा था, अनिकेत चुपचाप दूर खड़ा उन्हें देख रहा था. बात करने के बाद दढ़ियल ने एक बार अनिकेत की तरफ देखा थोड़ा सा मुस्कुराया,फिर सर को थोड़ा से झुका कर दूर से ही उसका अभिवादन किया, अनिकेत ने इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, दढ़ियल ने इसका बिल्कुल बुरा नहीं माना, चुपचाप उसने  अपनी साईकिल की सीट को शान से हाथ की थपकी  मार साफ किया और आगे चल दिया ,शरद ने बाइक स्टार्ट कर उसके पीछे लगा दी, अनिकेत ने टोपी लगाकर मुँह रुमाल से ढांप रखा था आंखों पर गहरे काले रंग का चश्मा था, अजीब सी संकरी तंग गलियों से होते होते एक अच्छे खासे मध्यमवर्गीय से दिखने वाले घर के सामने दढ़ियल की खटारा रुकी ,शरद उससे कुछ पहले बाइक रोक कर खड़ा हो गया,दढ़ियल भीतर गया फिर बाहर मुंडी निकाल के शरद को लाइन क्लीयर का इशारा किया, शरद ने बाइक को वहीं स्टैंड पर लगाया, और उस घर में दाखिल हो गया, अनिकेत के मन में उथल पुथल मची थी,'ये क्या कर रहा है? क्यों कर रहा है? गलत है , गलत है?किसी ने देख लिया तो क्या होगा ? क्या मैं ये सब करने ही आया हूँ? नहीं, इतना भी बुरा कुछ नहीं होता, आज देख ही लेते हैं....'

भीतर एक लगभग पचास वर्षीय खूसट बैठी थी, उसे देखते ही अनिकेत के तोते उड़ गए,

"ये है?"

'अबे नहीं रे, तू जा उस रूम में बैठ'

"देख अगर मुझे सही नहीं लगी तो मैं कुछ नहीं करूँगा , पहले ही बता रहा हूँ"

'हाँ हाँ हाँ, मेरे बाप फकीरचंद, सुन सुन के कान पक गए मेरे, तू बैठ उस रूम में..' कह कर अनिकेत को सामने एक रूम में भिजवा दिया, वहां एक बेड लगा था, शायद किसी को शादी में मिला होगा, किसी की सेज सजी होगी, सुहागरात भी मनी होगी, और आज.....सुहागदिन...... अजीब से लगने लगा सोच कर ही अनिकेत को, थोड़ी देर हुई होगी की शरद किसी महिला के साथ भीतर प्रविष्ट हुआ, महिला लगभग 30-35 वर्ष की रही होगी, आँखे भूरी जिन्हें काजल मल कर कजरारी बनाने की नाकाम कोशिश की गई थी, उसे देखते ही शरद अपनी जगह से खड़ा हो गया. सिर्फ इतना ही बोला , 'मैने तुझे क्या कहा था? मैं जा रहा हूँ...'

'अबे तेरे कौनसे पैसे लग रहे, पैसे तो मैं दे रहा हूँ ना, एक्सपीरियंसड है बेटा कोई दिक्कत नहीं होगी'

'मैं जा रहा हूँ' कहते कहते अनिकेत बाहर आ गया...पीछे पीछे शरद ..उसके पीछे दढ़ियल और सबसे पीछे खड़ूस बुढ़िया, शरद दढ़ियल को गालियाँ दे रहा था, भो@ड़ी के म@रचो@, जब तुझे पहले ही सब कंडीशन बताई थी मैने तो यहाँ क्या अपनी ## चु@@@ लाया था..? बुढ़िया पंजाबी में अपना अलग ही पुराण बांच रही थी, कुछेक शब्द अनिकेत के भी कानों में पड़े जिसका अभिप्राय ये था की अगर वो लोग ऐसे करेंगे तो उन पर भरोसा कौन करेगा.. अनिकेत ने उस ओर से अपनी नजरें व कान हटा लिए....

****

आज शरद और पुलकित का बीकानेर में एसएससी का एग्जाम था इसलिए  मेडिकल कॉलेज भी चले आए हैं, अनिकेत से मिलने, इसमे कुछ भी अजीब नहीं है, पर अजीब ये है कि अचानक ये लोग शरीफों वाली भाषा सीख गए हैं, अनिकेत अपने रैगिंग के किस्से सुनाते सुनाते अब धीरे धीरे 'शिकार' की खबरें भी सुना रहा है. रेडियो पर एफएम के गाने बजने लगे हैं.

#जयश्रीकृष्ण

अरुण

🗿🗿🗿🗿🗿 आई हेट यू ♠♠♠♠♠ .


वो रोज मुझे मिल जाया करती थी कहीं न कहीं, कभी तब जब माँ मुझे बाजार से कुछ समान लिवाने भिजवाती तो कभी स्कूल से आते जाते, मुझसे 4-5 साल बड़ी ही होगी,पर जाने क्यों मुझे वो बहुत आकर्षक लगा करती, बहुत भोली बड़ी प्यारी मासूम सी, तब भी जबकि वो हमेशा एक ही फ्रॉक पहने रहती , मैली कुचैली सी , घने काले बिखरे बाल, मुझे देख कर मुस्कुरा देती मेरा मन होता की उसके पास चला जाऊँ पूछूँ कि वो अपने घर क्यों नहीं जाती? नहाती क्यों नहीं? अच्छे कपड़े क्यों नहीं पहनती ? क्यों अकेले में घूमती है ? क्या उसके घरवाले गुस्सा नहीं होते ?  पर जब भी कोशिश सी करता तो कोई न कोई रोक देता,'अरे वो पगली है, काट लेगी, पत्थर मार देगी' . और वो ऐसा करती भी तो थी जब भी कोई उसे चिढ़ाता, उसके पीछे दौड़ पड़ती मारने को, पर मैं उसे चिढ़ाता थोड़े न हूँ जो मुझे मारेगी ..

एक रोज जब स्कूल से लौट रहा था तो देखा वो शिव पार्क के पास लंगड़ाती सी चली जा रही थी पैर पर जख्म हो रखे थे, चेहरे पर रोने क वजह से आंसुओं की गहरी स्याह लकीरें जमी थी,  एक मेज पर बैठ फिर से रोने लगी, रोक नहीं पाया में खुद को उसके पास चले जाने से, मुझे डबडबाई आंखों से देखा फिर हाथ के इशारे से अपने पास बुलाया , पूछा तुम्हारे पास खाना है ? मैंने कहा नहीं तो रुआंसी हो गई , उसे भूख लगी थी घर से दौड़ कर उसके लिए खाने को चार रोटी और अचार चुरा लाया चुपके से, वो टूट पड़ी खाने पर फटाफट रोटियां निगल गई बोली और नहीं है ? मैंने कहा नहीं इतनी ही थी बाद में और ला दूंगा. उसने प्यार से मेरे सर पर हाथ रख दिया, बोली..... भैया... सहसा उसकी आंखों के आंसुओं के कुछ कतरे मेरी आंखों में भी उतर आये थे.

माँ मुझसे बहुत खुश थी, राजा बेटा रोज टिफ़िन खत्म कर के लाता है, और अब तो ज्यादा खाना ले जाता है, मैं रोज उसे खिला आता, वो मुझसे बात करती बताती की उसका भी घर है ....बहुत दूर दूर........., माँ है....... पापा है .....बहुत सारी बहने हैं.....सब काम करते हैं...... पापा भी...., माँ भी....., बहने भी......., सब बहुत अच्छे हैं...... बस कभी कभी मारते थे, वो तो मैं थोड़ी भोली हूँ ना ........तो पापा डॉ के पास गए हैं दवाई लेने .......वो आएंगे .......आते ही होंगे .....आने वाले हैं.....वो बोलती चली जाती रोजाना...पर कभी कोई लेने नहीं आया ,उसके पैर पर चोट कैसे लगी पूछा तो बोली...वो टकला है ना ...मैं उसे मार दूंगी तुम देखना .... डबल रोटी उठाई थी.....मुझे मारा........तुम भी मारना....भैया...और मेरा मन सच में उस टकले का खून करने का हो जाता....पर वो बहुत बड़ा है...मेरे पापा जितना बड़ा......तो क्या हुआ...किसी दिन पत्थर से सर फोड़ दूंगा मैं भी.

एक दिन रोजाना की तरह पार्क में आया तो देखा सोनी, हाँ यही तो नाम बताया था उसने अपना, सोनी वहां कहीं नहीं थी, किसी ने बताया की सोसाइटी वालों ने भगा दिया उसे, उनके बच्चे डर जाते हैं उससे, बहुत दिन तक बहुत जगह ढूंढा आखिर बस स्टैंड के पास सोनी मिली...मुझे देख कर रोने लगी...मुझसे लिपट गई....कुछ लोग आए दौड़ कर...अरे रे बच्चे को मार देगी ये....... सहसा चिल्ला उठा मैं... हट जाओ.......दूर हो जाइए आप लोग....वो मेरी बहन है.

 "अच्छा तेरी बहन है तो तेरे बाप को बोल की घर ले के जाए इसको, कहाँ कहाँ मुं मारती फिरती है ...हुँह..'

'कल तेरी बहन को कुछ दारूखोर उठा कर ले गए थे, घर पर रखो इसे'

कई आवाजे आई भीड़ में से, पर फिर सब चले गए , पीछे बस रोते हुए सोनी और मैं बचे थे

*****

मुझे पापा से बहुत डर लगता है, वो बहुत गुस्सैल हैं, आज पक्का पापा को बोल दूंगा कि पापा मैं कभी और कुछ भी नहीं मांगूगा,पॉकेट मनी भी नहीं, कभी घूमने ले जाने को नहीं कहूँगा, आपकी सब बाते मानूँगा, खूब मन लगा कर पढूंगा कोई शिकायत का मौका नहीं दूंगा बस आप मेरी बहन को ले आओ , रोज सोचता हूँ की आज कह दूंगा पर कैसे कहूँ, उधर सोनी की तबियत भी खराब है जब देखो तब उल्टियां करती रहती है, उसे इलाज की जरूरत है,आखिर मां को बोल ही दिया....माँ मुझे मेरी बहन ला दो प्लीज....और रोने लगा....माँ ने चुप कराया... पापा के पास ले कर गई....बोली सुन लो अपने लाडले की बातें, रो रहा है, पता है क्यों, क्योंकि इसे इसकी बहन चाहिए, आप ला दो....पापा हंसने लगे...बोले '.हाँ बेटा ला देंगे बहुत जल्द ला देंगे, तुम रोओ मत, मेरा अच्छा बेटा......' मेरे पापा कितने अच्छे हैं ना , अब मेरी बहन यहां आ जाएगी फिर कोई चिंता नहीं हम खुशी खुशी साथ रहेंगे, खाना चुरा कर ले जाने की कोई जरूरत न रहेगी, कोई मेरी बहन को नहीं पिटेगा, कोई दारूबाज उसे हाथ नहीं लगाएगा, उसका इलाज अच्छे से हॉस्पिटल में होगा.

पर कितने दिन हो गए पापा उसे नहीं ले कर क्यों नहीं आते, सोनी की तबियत खराब होती जा रही है, उसका पेट भी खराब है फूलता जा रहा है,मैन  बोला था उसे भी कि पापा तुम्हे हमारे घर ले चलेंगे, वो कितना खुश हो गई थी , वैसे पापा ले जाएं या में एक ही तो बात है ना, पापा भी खुश ही होंगे मुझे शाबासी देंगे, राजा बेटा अच्छा किया जो अपनी बहन को ले आया, फिर हम सब खुशी से रहेंगे. डोरबेल बजाई पर माँ दरवाजा खोलते ही चौंक गई, ये कौन है और तुम इसके साथ क्या कर रहे हो? 'यही तो मेरी बहन है माँ, पापा इसे ही तो लाने वाले थे देखो मैं ले आया, इसकी तबियत खराब है इसका इलाज करवाना है माँ' पर ये क्या माँ ने मुझे भीतर खींच सोनी को जोर से धक्का दे दिया बाहर, कई तमाचे मारे मुझको, 'किस कुलच्छनी को उठा लाया है, घर गंगाजल से धोकर साफ करना पड़ेगा,  बेवकूफ, जाने किसका पाप उठाए घूम रही है,' सोनी बाहर खड़ी मुझे पिटता देख रही थी, उसकी आंखों में आँसू देख मैं भी रो पड़ा. शाम को पापा से शिकायत करूँगा सोचा था, पर मुझसे पहले मेरी ही शिकायत हो चुकी थी , पापा ने भी मारा मुझे, बोले आइंदा उस पागल के आसपास भी दिखे तो हड्डियाँ तोड़ दूंगा.

****

आज मौका मिला है सोनी से मिलने का, ना जाने वो कैसी होगी, कितने महीनों गुजर गए पापा ने रोज स्कूल आने जाने के लिए वैन लगवा दी है  उसी से आता जाता हूँ, खड़ूस है वो वैन वाला भी स्कूल पर ही उतारता है, आज मौका मिला तो निकल आया हूँ चुपके से , पर पार्क बस स्टैंड सब घूम लिया सोनी कहीं नहीं मिली, पता नहीं कहाँ चली गई, बेचारी उसकी तो तबियत भी खराब है , खाना भी कौन देता होगा, क्या पता वो टकले ने उसे फिर मारा हो, अगर मारा होगा तो इस बार मैं सर फोड़ दूंगा उसका चाहे कुछ भी हो जाए, उसी से पूछता हूँ जाकर.....हाँ.... लेक़िन ये कौन चला जा रहा...अरे ये तो वही है जो मुझे कह रहा था की अपनी बहन को घर ले जाओ, कहाँ कहाँ मुं मारती फिरती है..........अरे अंकल जी...सुनिए....सुनिए तो....हाँ आप...आपने मेरी बहन को कहीं देखा क्या ?

"कौन बहन? अच्छा तुम तो उस पगली के भाई हो न....अब आए हो बहन को ढूंढने, घर क्यों नहीं लेकर गए. वो वहाँ बस स्टैंड के पीछे की झाड़ियों में बच्चा जना था उसने, बच्चे को कुत्ते खा गए ,ले गए घसीट कर, छीन कर, वो भागती रही उसके पीछे फिर गिर गई और मर गई....खून बहुत बह गया था ना...."

'क्या....कहा....मर गई...? मुझसे बोला भी नहीं जा रहा...आँखों पर जोर नही चल रहा...अपने गाल भीगने से गीले गीले लग रहे हैं.'

अंकल बोले, 'अब क्यों रोते हो, दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं हैं, हमने उसका संस्कार करवा दिया था'

कुछ समझ नहीं आ रहा, किसे क्या कहूँ, लौट पड़ा उल्टे कदमों से, मन कर रहा है जोर से चिल्ला कर रो दूँ, कहूँ की "आई हेट यू माँ, आई हेट यू पापा"

#जयश्रीकृष्ण

©अरुण

rajpurohit-arun.blogspot.com

🍬🍷🔪💅 कुमार साहब का पान ♠♠♠♠♠ .


'अबे बस कर यार, अब कितना और चूसेगा ? देखो तो पूरी जान निकाल दी बेचारी की।' प्रदीप से मैंने कहा।

'ओहो तू मारवाड़ी है न पर सुन तू डफर भी है, सच्ची कुछ नहीं जानता, इस बात पर एक लुच्ची सी कहावत सुनाता तुझे ठेठ मारवाड़ी में, पर क्या करूँ एन्टी सोशल नहीं हो सकता, सब ऑनलाइन है क्या पता कब कौन कमबख्त जा के सब हमारी लुगाई को सब बोल दे' इतना कह कर शूकुल ने बीड़ी का छोटा सा अंगारा नीचे फेंक दिया।

हाँ जी यही वो जबरदस्त चीज थी जिसे शुक्ला जी लगातार चूसे जा रहे थे। जब तक बीड़ी नाख़ून से भी न पकड़ी जाए तब तक नीचे फेंकने की बात प्रदीप्त माइंड सोचता भी नहीं, करें भी क्या मजबूरी थी घनघोर मुफलिसी के दौर से गुजर रहे थे हम दोनों , मेरा तो चलो फिर भी जैसे तैसे फाकाकशी से गुजारा हो भी जाता था पर शुकुल को बीड़ी के बिना सवेरे प्रेशर भी नही आता था, यूँ की ये समझ लो की मशीन ही चोक हो जाती थी.

मरता क्या न करता मजबूरी में डॉ आलोक के यहाँ कम्पाउंडर हो गये . डॉ साहब बड़े सज्जन आदमी है , इंसान तो छोडो जानवर का भी घाव देखे तो रो दें झट से.....ऐसा हम सोचते थे, एक गोधे के घाव को बिटाडीन लगाने के चक्कर में पूरी पोस्ट पेल दी थी , पोस्ट पढ़ के पूरा डेढ़ गिलास आँसू बहाए थे हमने...... हम तो इधर इस चक्कर में आए थे क्योंकी डॉ साहब ने हमसे फिलिम में गाना गवाने का प्रॉमिस किया है , और शुकुल अपनी मशीन का चोक खुलवाने की फ़िराक में थे , लेकिन डॉ साहब को इसकी क्या परवाह सवेरे झाड़ू लगाने से लेकर दिनभर काम में लगाए रहते , अजीब अजीब नमूने आते और डॉ साहब घावों के चक्कर में हमसे उनका क्या क्या साफ करवाते और तो और रात को क्लीनिक में ही सोने के आदेश थे, अब हम तो ठहरे ढीठ मारवाड़ी , थोड़ा सख्त जान है मजबूरी को झेल रहे थे पर शुकुल जल्दी ही उकता गए. बोले यार ये सब हमसे न होगा, कल रात सपने में हमारी अभियांत्रिकी वाली डिग्री ऐसी ऐसी गालियाँ देकर गई कि का बताएं. हम तो जा रहे, हमने बोला की यार कल डॉ साहब तुम्हारी कोलोनोस्कोपी करने वाले हैं न, चेकअप तो करवा लेते और मैं अकेला यहां क्या करूँगा अकेले तो बोर हो जाऊंगा, ज्यादा ही है तो शाम को क्लिनिक बन्द होने पर हम दोनों ही निकल लेंगे. ई. साहब को भी बात जम गई, शाम को क्लीनिक बन्द होते ही हम दोनों निकल लिए, जवाहर चौराहे पे जब हम दोनों बनारसी पान चाप रहे थे, तो देखा अपने कुमार साहब ड्यूटी से फ्री होकर अधा जेब में अटकाए क्वार्टर पर जा रहे थे, हमको देखते ही खुश हो गए, बोले ,'का रे इधर किधर? कोनो काम धाम पकड़े की अभी भी उ मटरगश्ती चालू है ?'

हम बोले, ' साहब आप बचपन से ही जहीन थे , आप जैसा राजयोग तो हमारे नसीब में कहाँ, हाँ हम बहुते बढ़िया कम्पाउंडर बन गए हैं, आप पान खाइएगा ?'
साहब सम्बोधन सुन कर कुमार साहब इतराए, अपनी बायीं कॉलर ठीक की, पान की मीठी खुशबु से मुँह में भर आई लार निगली, फिर आँखे तरेरते हुए बोले, 'अमा छोड़ो, ये टुच्चा पान वान नहीं खाता मैं, मैदे पर जोर पड़ता है '

शुकुल करीब आए, इसरार करते हुए कहा, ' अजी आप तो तक्कलुफ करने लगे, हमारे पान से मैदा मजबूत हो जाएगा कसम से,मैं तो केता हूँ पान खा  लो आप' कहते हुए पान कुमार साहब के मुंह में खोंस दिया. पनियाए मुँह को जैसे मुँह मांगी मुराद मिल गई , कुछ मिनट तक भाव विभोर होकर पान चबाने के बाद ठुड्डी पर आई लाली साफ करते हुए कुमार बोले, ' वैसे शुकुल आदमी तुम बुरे नहीं , सच बताएं तो हम बचपन में हमारा बलूचिस्तान लूटने के बाद तुमसे खार खाए बैठे थे , पर आज दिल जीत लिया तुमने , बेहतरीन इंसान हो तुम और उससे भी बेहतरीन तुम्हारा ये पान, यूँ की मजा आ गया.'

शुकुल मुस्कुराए, बोले , 'ये तो आप साहब लोगों की ज़र्रानवाज़ी है, वरना हम किस लायक हैं हुजूर .'

'अब से तुम दोनों हमारे खास पंटर, चलो हम बताते हैं कि ऐश किसे कहते हैं' कह कर उन्होंने शुकुल के कंधे पर हाथ रखा और साथ ले चले, और हम दोनों के पीछे पीछे , क्वार्टर में हमे बिठा कर कुमार साहब बोले मैं अभी आया. उनके जाते ही शुकुल मेरी और आँख मार कर बोले,' आज बिना लिपिस्टिक लगाए इसका सारा डिस्ट्रिक्ट हिलने वाला है, हमने इसके पान में जुलाब की गोली चेपी है'😂😂😂😜

थोड़ी देर बाद जब कुमार साहब आए तो बोले 'अरे तुम लोगों ने ग्लास नहीं लगाए।'

'हम गरीब हैं साहब, अमीरों वाले तो शौंक ही नहीं पाले कभी, दारू नहीं पीते हम लोग', मैंने कहा।

'अबे तुम लोग क्या जानो जिनगी कैसे जी जाती है, मजा इसे कहते है बेवकूफो' कहते कहते कुमार साहब सटासट आधा अधा गटक गए।

शुकुल बोले,' हुजूर पानी शौंक नहीं फरमाते ? मेरा मतलब पानी नहीं मिलाइएगा ?'

'अबे छिलकों, तुम क्या जानो जिनगी कैसे जी जाती है, पानी तुम जैसे छुछुंदर लोग मिलाते हैं, हम सीधा जन्नत में पहुँचते हैं इससे, टाइम नहीं है अपने पास, फटाफट एक्शन चाहिए अपने को.....' वो बोलते जा रहे थे।

'पर हुजूर, अपनी फटाफट को ब्रेक लगाएं थोड़ा सा, आप लीक हो रहे हो...' कहते हुए मैंने उनकी गीली जंघा की और इशारा किया ।

हुजूर सकपकाए बोले , एं य्ये क् क्  क्य्या हो रहा है...' उनकी जबान लड़खड़ाने लगी थी और उठ कर भागने की कोशिश की पर फटाफट वाले नशे में धड़ाम से नीचे गिर कर बेहोश हो गए।

Er शुकुल ने उन्हें उठाया, नीचे गिरने से माथे पर चोट लगी थी, ढिमड़ा बन गया था. हमसे बोले अरुणवा हाथ लगाओ तनिक ऋषि कुमार को इलाज की सख्त जरूरत है. हमने भी फटाफट सहारा दिया और कुमार साहब को क्लिनिक ले आए , बेहोशी में भी कुमार साहब लगातार लीक होते जा रहे थे ऊपर से माथे पर चोट, ओटी में ला कर बेड पर उल्टा पटक दिया थोड़ी ड्रेसिंग शुकुल ने की थोड़ी हमने , सुबह के 4 बज रहे थे शुकुल बोले यार इसे देख कर तो उल्टी आ रही , मैं हाथ मुंह धो कर फ्रेश होकर आता हूँ ' मैंने कहा ठीक है तभी डोरबेल बजी, मैंने दरवाजा खोला तो सामने डॉ साहब खड़े थे. बिना कुछ बोले वो सीधे भीतर चले आए, अंदर मामला बदबूदार हो रखा था, मुझे डांटते हुए बोले, 'ये क्या हाल बना रखा है क्लीनिक का'

'जी..... वो......उसने......जुलाब.......लीक हो गया.....' हड़बड़ाते हुए मैंने अस्फुट से शब्दों में कहते हुए ओटी की और संकेत किया, डॉ साहब बोले,' यार ये तो शुकुल की हालत बहुत खराब है, तुम इधर आओ, अभी के अभी कोलोनोस्कोपी करते हैं'

'जी....पर...वो ....शुकुल तो.....'

'ये क्या जी जी लगा रखा है.....शुकुल का मुँह ढक दो, और इसकी पेंट नीचे खिसकाओ, उसे शर्म आएगी.......'

'ज ज जी...पर क्यूँ...'

'मारवाड़ी हो न, अक्ल तो होती नहीं .....अरे कैमरा डालना है ना'

'हैं...!!!?'

'अब तुम मुंह मत खोलो, तुम्हारे मुँह में नहीं उसके वहाँ अंदर कैमरा डालना है तभी तो बीमारी पकड़ में आएगी'

मैं अवाक् था, डॉ. साहब समझ गए की इससे कुछ न होगा, झट से एक तौलिया से मरीज का सर ढंक कर फट से एक पाइप जैसे दिखने वाले कैमरा के मुँह पर थोड़ी जेली डाली और मुझे कहा की इसके हाथ पकड़ लो , यंत्रवत आज्ञा पालन करते हुए मैंने कुमार साहब को काबू में कर लिया ,उधर डॉ साहब अपनी कार्यवाही को अंजाम देने में जुट चुके थे, थोड़ी ही देर में 'भीतर' का वीभत्स दृश्य कम्प्यूटर की स्क्रीन पर जीवन्त हो उठा जिसे देख देख कर डॉ. साहब कुछ एनालाइज कर रहे थे....तभी बाथरूम से निकल कर शुकुल डॉ. साहब के सामने आ खड़े हुए......अब अवाक् होने की बारी डॉ साहब की थी....कैमरा हाथों से छूट गया, हड़बड़ा गए, जैसे जीवित इंसान नहीं किसी भूत को देख लिया हो.....

*****

कुमार साहब हमारे बहुत आभारी हैं , क्योंकि हमने उन पर संकट आने पर भी उनका साथ न छोड़ा, और डॉ. साहब की तरफ से हम दोनों को एक निश्चित वेतन हर माह दिया जा रहा है, दरअसल शुकुल ने बंडल मारा था कि उनकी उस सज्जनता को उन्होंने अपने कैमरा में कैद कर लिया है, जिसे सार्वजनिक करने पर ये पुलिसिया न जाने क्या क्या करेगा.

#जयश्रीकृष्ण

©अरुण

Rajpurohit-arun.blogspot.com

🌹🌹🌹🌹🌹 अनुपम प्रेम ♠♠♠♠♠


.
एक सुबह अनुप मेरे पास आया, बिखरे बाल , गालों पर आँसुओ के जमने से बनी रेखाएँ, सूज कर लाल हुई आँखे, कुछ न बोला आकर चुपचाप बैठ गया।

इतना क्लांत उसे इससे पहले न देखा था, पूछा हमने कि,'प्यारे ये क्या हाल बना रखा है, कुछ लेते क्यों नहीं?' इतना सुनना था कि अनुप की आँखों से नोबिता के समान दोनों और दो झरने झर झर बहने लगे, हम भी बह ही जाते अगर अनुप को ही कस के पकड़ न लिया होता पर सहम गए कि यार ऐसा तो कुछ बोला भी नहीं तो फिर ये हो का रिया है। झट से दो बाल्टी उसके दोनों और रखी, रुमाल के काम करने का सवाल ही पैदा नहीं होता था इसलिए बैडशीट से उसका चेहरा पोंछा, फिर दोबारा प्यार से पूछा ,'प्यारे हुआ क्या है ?' इतना सुनते ही अनुप ने मुँह उठाया और बुक्का फाड़ के शुरू हो गया, बहुत करुण दृश्य था पर मारवाड़ी लोग पकाना जानते है पकना नहीं इसलिए बेडशीट उसके खुले मुँह में ठूस दी, और कहा , 'अबे ओये, प्यार से पूछ रहे तो बताते काहे नहीं हो, वो डंडा देख लो, अब अगर एक भी आँसू गिरा तो खोपड़ी फोड़ देंगे, सवेरे सवेरे माथा खराब कर रखा है। अब बोलो ढंग से बताते हो कि सेवा करवाओगे पहले ?' अनूप के आँसू झरना झट से बंद हो गया जैसे किसी ने मोटर बन्द कर दी हो पीछे से, बेडशीट का आख़िरी कतरा मुँह से बाहर आते ही उसने कातर नज़रों से मुझे देखा और मैंने गुस्से के साथ डंडे को, थूक निगल कर अनूप तोते की तरह शुरू हो गया, 'का बताई अरुण भैया, ई दुनिया भोत जालिम है, यूँ की ये मेरे जैसे अच्छे लोगों के लिए तो बनी ही नहीं है।'

मैंने उसे टोका,' अबे सुन, ये 'अच्छे लोगों वाला' डायलॉग नहीं बोलने का, साला पहले भी ये चिपका के पोपट बना गया था हमको ',फिर दो गहरे सांस छोड़ें बी पॉज़िटिव यार बी पॉजिटिव मन्त्र उच्चारा और अनूप को कण्टीन्यू करने को कहा। वो शुरू हो गया,' भैया आपको पता है आज बीस साल के हो रहे हैं हम,कोनो गर्लफ्रैंड नहीं, इस्कूल में भी लड़कियाँ हमसे ऐसे दूर रहती थी जैसे हम साले टीबी के मरीज है, दिल दुखता था हमारा पर सह लिए हम , की कभी तो कोई कन्या होगी जो हमसे मुहब्बत का इजहार करेगी, साला घण्टा नहीं किया किसी ने भी , फिर एक दिन गौरव बोला कि  'आजकल फेसबुक का जमाना है, तुम साले उस माल से उम्मीद लगाए रहते हो जिसकी बिल्टी किसी और ने पहले ही कटवा रखी होती है', तो हमने भी प्रोफाइल बना लिया, पर क्या करें इधर देखा तो इधर भी वही हाल है , इतनी रोमांटिक शायरी चेपते है पोस्टवा में, की कोई पढ़ ले तो करेजा मुँह को आ जाए, पर कोई कम्बख्त आना तो दूर देखती तक नहीं. जैसे हमने पोस्ट पर लेंडमाइन्स बिछा रखी है 😢'

इतना बोल कर वो मेरा मुंह ताकने लगा, हम बोले ' हो गया तुम्हारा? अच्छा तो फिर सुनो अब आराम से , ' देखो प्यारे प्यासे को कुएँ के पास चल के जाना पड़ता है, कुआँ कभी चल के नहीं आता'

'मतलब'

'मतलब ई बिरादर, की पहले प्रोफाइल की प्राइवेसी हटाओ लड़की लोगन को ऐड करो और उसके बाद भी जिसे तुम पसंद करते हो उसके पास तुम्हे खुद जाना पड़ेगा.'

'पर अरुण भाई हमें तो सब की सब पसंद है'

'बस यही गधापन कंट्रोल करना है प्यारे, अबे हर किसी से हो जाए वो दीवानापन नहीं कमीनापन होता है.'

'अच्छा और आप जो हर लड़की के कमेन्ट पर लार चुआते हो उसका क्या...?"

'अबे वो तो हठयोग है हमारा, और वैसे भी सब कन्याओं को एक ही नजर से देखते हैं हम 😉 सब को पता रहता है की मजे ले रए फोकट में बकैती कर के '

'तो मैं भी वही करूँ ?'

'वैसे ऐसी बातें बच्चों को 'शोभा' नहीं देती पर ...तुम कर सकते हो तो जरूर करो, अगर नहीं तो वो कन्या चुनो जिसे देख के जिगर का तानपुरा अपने आप बज उठे'

'अच्छा, फिर..'

'फिर क्या, बतियाओ उससे , हँसी और फंसी का डायलॉग नही सुने हो ? खुश रखो उसे , कुछ भी मांगना नहीं उससे, वो खुद बा खुद दे देगी'

'क्या...?'

'अबे ठरकशिरोमणि , उसके नम्बर की बात कर रहा हूँ मैं '

'अच्छा अगर कोई बात ही न करे तो....?'

'ओहो दुःखी आत्मा , तो कौनसा भूचाल आ जाएगा, वो नहीं तो उसकी कोई और बहन करेगी...टीराइ टीराइ अगेन सुने हो की नहीं  :), और सुनो चौखटा जरूर सुधार लो पहले, आजकल जो दिखता है वही बिकता है, पुराना डायलॉग है पर मौके की नजाकत देख के फिर चिपका रहे हैं कि 'थोबड़ा तबेले जैसा बनाए रखोगे तो गोबर ही मिलेगा' थोड़ा पिच्चर विच्चर देख के हीरोगिरी सीखो मियाँ'

'ओके.....' इतने आत्मविश्वास से अनूप ने कहा की लगा कि बात समझ गया पठ्ठा, तुरन्त उठा और लपक के निकल गया.

****

विवेक मिश्र की अंग्रेजी क्लास चल रेई, इं. शुकुल बाबू आज के आज चौथी बार पिटे हैं अपनी भेरी स्टाइलिश अंग्रेजी उवाचने के चक्कर में, पर इन्हें मार से कोई दिक्कत नहीं , ढीठपन का गुण यूँ भी इन्हीं से बाकी दुनिया को प्रसाद रूप में वितरित हुआ है , पिटने के बाद वापस दरी पर बैठते बैठते ही खुन्नस में अजीत के मुक्का धर देने से बाज़ नही आते , हमारे पास भी नहीं बैठे आज तो ....जाकर अफ़जलवा से गलबहियाँ डाल रहे हैं, सिचुएशन के हिसाब से ' दोस्त दोस्त ना रहा' गाने का मन हुआ था पर सोचा पहले 'उदास' बोला था अब ना जाने किस मरियल की उपमा चेप दे, इसलिए चुप हो रहे। अचानक अजीत खड़ा हुआ.....शायद कुछ पूछना होगा।

'विमी गुरु, एक ठो बात बताइए....'

गुरु जी ने धर देई कंटाप फट से, बोले 'इस्पीक इन इंग्लिश ओनली..'

कान सहलाते अजीत बोला कि, 'गुरु अंग्रेजी नहीं आती एही लाने तो यहाँ आए रये, आप तो जे बताओ बच्ची की पोट्टी  को इंग्लिश में कैसन साफ़ करें'

'व्हाट रिडिक्यूल्स, आई एम् हियर टू टीच यू इंग्लिश लैंगुएज, नॉट टू टेल अबाउट द् प्रॉसेस हाऊ टू क्लीन द शिट ' गुस्से में तमतमाए विमी गुरु बोले।

हमने ज़बरन अजीत का हाथ पकड़ के बैठाय लियो, 'अबे देख नहीं रए गुरु गुस्सा हो रो, अब जे एक कंटाप और धर देइहें तो का इज्जत रह जाई ससुर।'

'बात तो तुम भी ठीक ई के रे, पन वो पोट्टी...?'

'अबे वो शुकुल से सीख के साफ कर लेइयो, वो ख़ुशी ख़ुशी सीखा देगो '

'घण्टा वो देखो शुकुल तो अफ़जलवा की गांव में घुसरो, बात करन की तो फुरसत ना मिलरी'

'हाँ दया मेरो मतलब, कुछ तो गड़बड़ है अजीत'

क्लास से छूटे तो शुकुल जी अफ़जलवा को अपनी खटारा के इकलौते डंडे पे बैठाए झट से निकल लिए, अजीत और हम भी फट से अपनी फटफटी दौड़ाये , पूछे, 'शुकुल प्यारे बोलते थे की मौसम नहीं है जो बदल जाएंगे आज साले इस फ़टे ट्यूब के लिए दोस्तों को छोड़ आए।'

शुकुल अपना गुस्सा पैडल पर चलाते चलाते ही बोले,' अबे तुम दोनों को कुछ ना पता, उ जो अफ़जलवा की बहिन सलमा है ना, (सलमा का नाम एक्स्ट्रा मक्खन मार के बोले थे)  सबेरे से गायब हैं, उसी को ढूंढने जा रहे, ना जाने कहाँ होगी बेचारी ' शुकुल का एक आंसू तुपुक कर के अफ़जलवा के टकले पर गिरा।

'ओह अच्छा अच्छा, मिल जाए तो बताना हमें भी', कहने के साथ हम फटफटी दौड़ा के निकल गए, अजीत बोला , शुकुल तो अच्छा आदमी है यार पर तुम भी टुच्चे निकले बे, अफ़जलवा की मदद हम लोग भी करते, रुके काहे नहीं ?

'अबे, इसलिए क्योंकि हम जानते हैं की सलमा कहाँ है.."

'कहाँ?'

'वो ससुर अनुपवा के साथ बसंत मेंगो बार में कुल्फी चूस रही है बे.......'

©अरुण

#जयश्रीकृष्ण

🎪🎪🎪🎪 तिरुशनार्थी ♠️♠️♠️♠️

एक बार एग्जाम के लिए तिरुपति गया था। घरवाले बोले जा ही रहे हो तो लगे हाथ बालाजी से भी मिल आना। मुझे भी लगा कि विचार बुरा नहीं है। रास्ते म...