🚫🚫🚫🚫🚫 तेरे नाम से शुरू, तेरे नाम पे खत्म / झुमरू ...अंतिम भाग ♠♠♠♠♠ .


"कम ऑन यार, अब इतना भी शक्की नही होना चाहिए , वैसे भी वो मेरे बारे में जानता ही क्या है...?"

"एग्जेक्टली..मैं भी वही कह रही हूँ, तू भी तो कहाँ कुछ जानती है उसके बारे में...पता नही कौन है, सो इट वुड बी बेटर टू कीप डिस्टेंस फ्रॉम सच फुलिश फेल्लोज... पता नही क्यों तू उसके लिए हलकान हुई जा रही.."

"नॉट अगेन यार, अब मैं कोई बच्ची थोड़े न हूँ, उसके पास मेरा नम्बर तक नही है, एक्चुअली उसने कभी माँगा ही नहीं....दैट्स द् थिंग आई लाइक हिम , वो अलग है सच में ...कभी कोई डिमांड नहीं सिवा इसके की उससे बात करो... और उसमे बुराई क्या है...एंड ..इवन आई आल्सो लव टू टॉक विद हिम .."

"अच्छा है अगर नम्बर नही दिया तो, मेरी मानो तो कभी देना भी मत...नम्बर नही दिया तब भी इतना पका रहा है..बाद में पता नहीं क्या करेगा...और सुन तुझे पता नही लगता पर तू भी उसके जैसी पकाऊ होती जा रही है ...कल भी आधा घण्टा बोर के गई हूँ तेरे घर से... मैं यहाँ तुझसे मिलने आती हूँ उसकी बोरिंग चैट सुनने नहीं..समझी"

"नाराज क्यों होती हो, अच्छा तुझे नही पसन्द तो अब से उसकी बात नही करूंगी तुझसे..ओके खुश ....जानी ... तेरे लिए तो हम कुछ भी कर जाएंगे, बोले तो सु- सु- सु- सुसाइड कर के दिखाऊँ, तू रुक मैं वाश रूम हो के आती हूँ... सु सु एट  साइड...हाहाहा"

"दिमाग खराब हो गया है तेरा सच में, कहा था न.. 😬😬😬😬😬😬😬 तू उसके जैसी पकाऊ होती जा रही है...पहले दस बार बुलाने पे बोलती थी अब चुप करने के लिए दस बार बोलना पड़ता है.....शर्म तो बेच खाई लगता है.....सुधर जा ..सुधर जा....तेरा ही फायदा है...."

"हेहेहे, क्या यार अदिती, अब तुझसे भी मजाक न करूँ जानेमन ? जिंदगी झंड हो जाएगी तब तो...ऊप्स...आँखे मत दिखा यार..आती हूँ रुक.."

****

'अच्छा बोलो मेमसाब किधर जाओगे रामगढ के शामगढ़...बैठो तांगे पे, रामगढ का एक रुपया शामगढ़ का दो रुपया...आप सोचोगे के रामगढ और शामगढ़ की दुरी एक ही जितनी है फिर रामगढ का 1 और शामगढ़ का 2 रुपया क्यों, यूँ की अब पूछने वाली बात ये है की तांगा कहाँ का है...पूछो पूछो..?'

"नहीं पूछना मुझे कुछ भी, जब देखो तब बक-बक बक-बक, थकते नही तुम इतना बोल बोल के"

'कहाँ बोलता हूँ यार, वो तो मेरी उँगलियाँ बोलती है...हाहाहा ;)'

"चुप रहो, घर में भी इतना ही बोलते हो ? सब कितने परेशान हो जाते होंगे तुमसे, मुझे तो उन बेचारों पर तरस आता है बाय गॉड"

'हाँ मुझे भी...'

"तुमको क्यूँ?"

'वो बस ऐसे ही....तुम भी कहाँ मेरी बातों पर सीरियस हो रही हो'

"येस राईट ..तुम तो हो ही पागल...और पागलो की बात लो सीरियस नही लेना चाहिए हेहेहे"

'हाँ अब सही जा रही हो...एक बात बोलूँ..?'

'तुम हँसते हुए भोत अच्छी लगती होगी, हैं ना ? तुम यकीन नहीं करोगी पर मैं तुम्हारी खिलखिलाहट सुन पाता हूँ सच में..'

"अच्छा जी, अब बोलोगे की काश सच में भी सुन पाता , है ना .."

'हाँ...पर'

"कोई पर वर नहीं नम्बर तो भूल कर भी मत मांगना.."

'नहीं मांग रहा यार...सच में...😢'

"ओह कम ऑन यार , ये सैडी सैडी शक्लें मत बनाओ अब तुम, और ये तुमको सूट भी नहीं करता "

'हेहे अच्छा तुमको बड़ा पता है मेरे बारे में..?'

"हाँ ज्यादा नही पर थोड़ा तो जानने ही लगी हूँ तुमको"

'अच्छा क्या क्या जानने लगी हो बताना जरा...?'

"और कुछ नही बस इतना ही..कि तुम पागल हो..हाहाहा"

'हेहेहे सही जवाब...आपको मिलता है..आपकी ढेर सारी जुओं के लिए डिनर सेट....बोलो कब भिजवाऊं'

"चुप रहो, तुम्हारे ही होंगी जुएँ, मेरे बाल बहुत खूबसूरत हैं और मेरे कभी जुएँ नही पड़ती समझे , खुद का एक्सपीरियंस याद आ रहा होगा तुमको डफर.."

'अपने तो चांस ही नही ,सर पर पड़ोसी की जूं भी आ जाए तो फिसल के धरती माता को प्रणाम करने लगेगी, आई एम् पैदायशी टकलू डार्लिंग'

"हाहाहा.....यू आर मेड..सच में पागल हो.."

'प्यार चीज ही ऐसी है, स्वीटी, अच्छे भले इंसान का भेजा खराब खराब कर देता है....'

"चुप रहो तुम, कुछ भी बोलते हो.....ज्यादा बकवास की तो सीधा ब्लॉक कर दूँगी"

'ओके पर कसम है तुम्हे चुन्नू की अम्मा, बस अपने दिल में ब्लॉक करना....'

"पागल पागल पागल......पागल हो तुम....हटो, मुझे जाना है, बाय"

'हटो तो यूँ बोल के जा रही है जैसे सच में .....बाँहो के दरमियाँ, दो प्यार खिल रहे थे.....हीहीही'

"हुँह, बाय बाय घोंचू"

'ओके लव यू टू.. दिलबरा'

****
तन्मय आज भी ऑनलाइन नही आया...पर ऐसा कैसे हो सकता है ...वो तो बोलता था की मैं 24 में से 26 घण्टे ऑनलाइन रहता हूँ , इवन मुझे ही वक़्त नहीं मिलता था उससे बात करने का...इतने महीनों में ऐसा एक बार भी नही किया उसने....पिछले 4 दिन से ऑफलाइन है...क्या करूँ....पर मैं उसके बारे में सोच ही क्यों रही हूँ...ना आए तो ना आए मेरी बला से....मुझे क्या फर्क पड़ता है....पर यार क्या मैं इतनी बुरी हूँ जो अपने ईगो के चलते उसे एक मैसेज तक न करूँ....पर करूँ भी किसको...4 दिन पहले का ऑनलाइन शो हो रहा है...क्या फायदा...करने का भी......अरे नही...जब वो आएगा तो उसको कितना अच्छा लगेगा ..हाँ..

"ओये डफर..ज़िंदा तो हो न..."

"मुझे लगा लुढ़क गये"😂😂😂

"हे सॉरी यार..."

"नाराज़ हो क्या मुझसे"

"हे तन्मय....आई रियली मिसिंग यु बड्डी 😢"

"यार तुम तो ऐसे कभी न थे...कितने दिन हो गये पता भी है..."

"मेरी ही गलती है यार...पता नहीं क्यूँ.... सब मेरी ही गलती है...मैंने ही कुछ गलत बोला होगा तुमको..."

"कुछ गलत बोल दिया हो तो सॉरी यार"

"अब तो चले आओ....एक महीना होने को आया यार...यूँ ही दिलबरा बोलते रहते थे? ऐसे कौन करता है अपनी दिलबरा के साथ... हँसते हँसाते रुलाने क्यों लग गये यार"

"तुम बहुत बुरे हो...देखो मैं भी तुमसे कभी बात नहीं करूंगी.."

2 महीने गुजर गए न तन्मय ऑनलाइन आया और न ही उसका कोई जवाब , आस्था बहुत मिस करती थी इस पागल को...दिल के किसी कोने से आवाज आती...सब ठीक नहीं है ..कुछ बहुत बुरा हुआ है शायद....एक दिन बैठे बैठे उसका प्रोफाइल खंगाला ..संचित बंसल ....कहीं ये संचु तो नहीं..? पता नहीं...पर...कभी किसी अनजान को रिप्लाई करने से पहले हजार बार सोचने वाली आस्था ने आखिर संचित को मैसेज भेजने की हिम्मत कर ही डाली... कुछ देर में उधर से रिप्लाई भी आया...

'हूज दिस...?'

"आई एम तनु'ज फ्रेंड...डू यू नो व्हेयर ही इज..."

'वेट...यू आर दैट आशु राईट..'

"यस ..आई एम.. नाउ प्लीज टेल.."

'आई हेव नथिंग टू टेल यू आस्था, वेट लेट मी शो यू समथिंग....'

संचित ने कुछ तस्वीरें उसे भेजी, पहली जिसमे एक मासूम सा दिखने वाला लड़का एक शरारती मुस्कान दिखा रहा था, फिर कुछ और जिसमे वही लड़का किसी हॉस्पिटल में एक बेड पर अचेत लेटा था...नाक में ऑक्सिज़ेन पाइप लगी थी ...पर अब भी मुस्कान मानो जबर्दस्ती अपनी जगह बनाए हुए थी..

'ये है तनु..'

"ओह गॉश ये सब क्या है...क्या हुआ उसे.."

'ही इज नो मोर डिअर... वो अब इस दुनिया में नहीं है...गले का केंसर था उसे ...एक साल से ज्यादा हुआ..आवाज़ चली गई...बहुत बातूनी था...चुप कैसे रहता...और कुछ नहीं मिला तो सोशल साइट पर शुरू हो गया...6 महीने से यहीं था... हॉस्पिटल में बैठे बैठे लोगों को पकाता रहता ...खुश रहने की कोशिश करता.. .. तुम्हारे बारे में भी बताता था हमको..की कैसे तुम्हे परेशान करता है... न जाने तुम उसे क्या समझती होगी ..पर वो बस ख़ुशी तलाशता था तुम से भी... उसने कहा था की अगर तुम कभी उसके बारे में पूछो तो ही कहूँ...खुश रहना यार बस'

आस्था को सहसा यकीन ही नहीं हुआ...ऐसा कैसे हो सकता है,....फोन हाथ से छूट कर गिर पड़ा, मन हुआ की खूब ज़ोर से फफक फफक कर रो पड़े अभी, बकबक करके से बातों में लीन करने वाला चिर निद्रा में लीन हो गया था चुपचाप...😢
....
अब भी आस्था तन्मय को याद करती है, जब भी उसकी बातें याद आती है होंठो पर आई मुस्कान के साथ चुपके से एक छोटा सा आंसू भी आँखों में तैर ही जाता है, पर रोती नहीं क्योंकि उसे किसी महान इंसान ने बोला था कि खुश रह कर ज़िन्दगी सँवारो डार्लिंग, झंड तो ये खुद बा खुद हो जाती है. अपनी कोई भी तकलीफ अब तकलीफ जैसी लगती ही नहीं....तकलीफ को लात मार के जीने का सबक जो सीख लिया उसने.

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#जयश्रीकृष्ण

©अरुण

😜😜😜😜😜 क्रेक जेक 50-50/ झुमरू ...पार्ट 2 ♠♠♠♠♠ .


'अजी सुनती हो ? दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे'
.......
'लाइट जलिंग मतलब ऑनलाइन होइंग बट नो रिप्लाइंग ,मने सरेआम बेज्जती, खैर वो तो कोई नई बात है नहीं, ए सुनो  सुन रही हो ना, नही सुन रही ? देखो बात करो न मुझसे...... नहीं कर रही ?"
........
'अमा दिल तोड़ रही हो चुन्नू की माँ ?'
........
'हाए वे रब्ब जी अब मैं कहाँ जाऊँ ये टुटा हुआ दिल लेकर , चल बेटा तन्मय बहुत लीन हो लिया, ये नहीं सुनने की'
........
'पर कहाँ जाऊँ ? जाऊँ कहाँ बता ए दिल दुनिया बड़ी है संगदिल.....चुप बे सैड सांग के सगे वाले...जब देखो गाना बजता रहता है खोपड़ी में.....पर ये बात ही नही कर रही तो क्या करूँ.....क्या करूँ क्या करूँ.......आईडिया....एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया....वाह ये हुई न बात.....तुम क्या सोचती हो एक कागज पे टुच्ची सी मोहर नही लगेगी तो तारा पाकिस्तान नहीं जाएगा...? आई मीन तुमको क्या लगता है तुम मुझसे बात नहीं करोगी तो मैं बात करना बन्द कर दूंगा ...? ओजी मैं तो अकेले में दीवारों से बात करके टाइमपास करने वाला बंदा हूँ , अब तन्मय का तन , मन से बात करेगा अभी के अभी...हाँ तुम वही कंटिन्यू करो जो कर रही हो.....बड़ी आई'
..
'@ हाँ तो भैये तन का हाल चाल बा'
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'@ बिलकुल झक्कास मन भाई'
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'@तन ,बहुत दिन बाद दिखाई दिए यार'
..
'@मन, झूठ नही पार्टनर, झूठ नही, जग से कोई भाग ले चाहे मन से भाग न पाए ....मैं दिखता नहीं और हमेशा होता हूँ '
..
'@तन , देख अब ये फिलोसोफी झाड़ के दिमाग मत खराब कर मेरा...'
..
'@मन, क्यों क्या हुआ...'
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'@तन, अभी तो बोल रहे थे की सब पता है, जब सब पता है तो पूछ क्यों रहे हो झोपडी के...'
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'@मन, अरे पता तो भगवान जी को भी सब रहता है, पर फिर भी पुकार लगानी पड़ती है कि नहीं...'
..
'@तन , पॉइंट है तो तेरी बात में, चल छोड़ इसे ये बता कि ये मैडम मेमसाब तुमको कैसी लगती है...'
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'@मन , ओहो अपनी बात मेरे मुंह से सुनना चाहते हो हाँ ....हमसे चालाकी ..'
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@तन, बोल न यार...'
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'@मन, सुन प्यारेलाल, अपने को तो सब अच्छी ही लगती है , इस दुनिया में बुरा सिर्फ नजरिया होता है और कुछ भी नही, खूबसूरती देखने की नजर हो तो धारावी की झोपड़ पट्टी होंगकांग से ज्यादा खूबसूरत लगेगी..,जिसे दोष ही निकालने हो वो तो सीता माता में भी खोज लेगा .'
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'@तन...अबे ओये , पका मत समझा... बोला था ये फिलोसोफी किसी और के सामने झाड़ना'
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'@मन, अब मुझसे तुम बुलवाना क्या चाह रहे वो बताओ...अच्छा सुनो इस मैडम को बोल देना की हमको इससे बात करना पसन्द है, और हाँ थैंक्यू भी बोलना, बड़े वाला, कहना मन ने बोला है मन से.. :)'
..
'@तन , अच्छा तो ये बात है... जुम्मा जुम्मा चार रोज हुए है तुझे इनसे बतियाते हुए....और.....चलो...तुम भी क्या याद करोगे बोल देंगे यार...पर घण्टा बोल देंगे, किससे बोल देंगे, जिससे बोलना है वो तो बत्ती जला के न जाने किस अँधेरे में घूम रही'
......
.........और  वो आ गई जिसका इंतज़ार  था......

" हाहाहा Lolzzzz  ये सब क्या है......तुम सचमुच पागल हो ..."

'भगवान तेरे घर देर तो है, अंधेर भी है यही मान लेता सच में अगर आज ये मुझसे बात न करती तो.....यार तुम ऑनलाइन थी पर मुझसे बात नही कर रही थी तो और क्या करता बताओ?'

"क्यों कुछ और काम नहीं है...अच्छा तुम करते क्या हो"

'कुछ नहीं मैं बस बातें करता हूँ , कुछ हैं जो कहते हैं की बड़ी प्यारी बाते करता हूँ पर सच्ची बोलूं, अंदर की बात है किसी को बताना नहीं, मैं प्यारी नहीं ढेर सारी बातें करता हूँ, और मुझे कोई न कोई चाहिए होता है जो मुझसे बात करे....और कुछ नहीं चाहिए यार कुछ भी नही...'

"तुम सच में अज़ीब हो , बहुत अलग हो, सच कहूँ तो तुम्हारी ज्यादातर बातें मेरे पल्ले ही नहीं पड़ती, अच्छा मुझसे कुछ नही पूछोगे ?"
'नहीं, कुछ नहीं पूछना'

"क्यों, तुम मेरे बारे में कुछ नहीं जानना चाहते ?"
'चाहता हूँ, अच्छा बताओ'

"क्या बताऊँ?"

'वो जो तुम्हे बता कर और मुझे सुनकर ख़ुशी मिले, कुछ भी ऐसा जो तुम नहीं बताना चाहती, प्लीज मत ही बताना..'

"क्या यार, ऐसे कोई कैसे कुछ बताएगा, अच्छा सुनो, मेरा नाम वही है जो प्रोफाइल पर लिखा है, घर पर सब आशु बोलते हैं"

'हाहाहा ये तो हद ही हो गई, पता है मुझे घर पर तनु बोलते हैं मने लड़कियों वाला नाम और तुम लौंडो वाला आशु नाम लिए घूम रही हो,हाहाहा चल हाथ मिला यारा, हमारी खूब जमेगी'

"कुछ भी हाँ.....?"

'ओके सॉरी सॉरी.....😂😂😂😂'

"जाओ मैं नही कुछ बताती"

'हे भगवान मैं इसे कैसे समझाऊं के जब ये गुस्सा होती है मुझे ज्यादा वाला प्यार आता है इस पर...😂😂😂😂😂😂'

"तुम कितने फ्लर्टी हो यार"

'फ्लर्ट? ओजी ना, इसक है सच्चे वाला...दुनिया में जितने भी आशिक हुए हैं पता है इनको इंस्पिरेशन कहाँ से मिली थी?'

"कहाँ से?"

'बताओ, पूछने को नही बोला....'

"मुझे नही पता , तुम ही बताओ.."

'ऑफकोर्स मुझसे और किससे... हाहाहा'

"अब तुम पकाना मत शुरू करो ओके..बड़े आए..अच्छा ये तो बताओ तुम्हारा बेस्ट फ्रेंड कौन है"

'अभी तो तुम ही हो, क्योंकि तुम मुझसे बात कर रही हो, वैसे है एक नमूना और भी ....संचित,,,संचु बोलता हूँ मैं उसको'

....................और वो बोलता गया बोलता गया..लगातार बिना रुके बिना थमे अपनी कभी न खत्म होने वाली बातो के साथ तन्मय, वाकई उसे लीन कर डालता, आस्था एक 19 वर्षीय मॉर्डन लड़की थी, हमेशा तहजीब और तमीज से बात करना सीखा था, कुछ भी बोलने से पहले 100 बार सोचने वाली , पर बिना विचारे कुछ भी बोलने वाला ऐसा कोई कार्टून पहली बार  एक्सपीरियंस कर रही थी.. इतना अनाड़ी, इतना बेवकूफ और इतना भोला कोई कैसे हो सकता है..? उससे बात करके बिल्कुल अलग अनुभव होता, लगता जैसे कोई मजेदार नौटंकी चल रही है और वो खुद भी उसका हिस्सा है...

क्रमशः .........

#जयश्रीकृष्ण

©अरुण

Rajpurohit-arun.blogspot.com

😂😂😂😂😂 झुम-झुम झुम-झुम झुमरू

♠♠♠♠♠
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'हेल्लो हेल्लो कोई है.......'
'ओ हेल्लो , वन टू थ्री हेल्लो वन टू थ्री ......अल्फ़ा टू डेल्टा अल्फ़ा टू डेल्टा.....कोई सुन रहा है...?'
' कमाल है यार लोग फोन हाथ में लेके सो क्यों जाते हैं.....ओजी याद में तेरी जाग जाग के हम रात भर करवटें बदलते हैं......'
'अजी म् केया घरे ई ओं मालको...'
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"???????"

'यू नो, आज इत्ते दिन में पहली बार रिप्लाई किया है आपने, पता भी है लेट रिप्लाई करना कितना बड़ा क्राइम है...? गरीब की हाय से न सही पर भगवान से तो डरो'

"माय फुट, यु आर मेड और व्हाट..? डोंट यू अंडरस्टैंड...आई एम् नॉट इंट्रेस्टड इन टॉकिंग विद् यू"

'ओजी इंटरेस्ट का की है आज नहीं है कल हो भी सकता है, परसों फिर से नही होगा...पर हम ये कल परसो के चक्कर में अपना आज क्यों खोएं ? समझ नही आया न..? एक्चुअली मुझे भी नही आया..😂😂😂😂.पता है पहले मुझे कद्दू की सब्ज़ी बड़ी बकवास लगती थी, पर आजकल गपागप खा जाता हूँ वो भी कटोरा भर के...क्या समझे..?'

"कुछ भी नहीं समझी मैं और कुछ समझना भी नहीं चाहती , आप अपनी कद्दू की सब्ज़ी का कटोरा उठाओ और निकलो इधर से, पता नहीं कहाँ कहाँ से चले आते हैं मुंह उठा के..."

'हाय ओ रब्बा, इन्नी बेज्जती, वैसे हिसाब से तो आपके इस बेज्जती वाले डायलॉग पर मेरा सुसाइड करना बनता था पर हम बंदे जरा दूजी किस्म के हैं... और मैं मर गया तो मेरे घरवालों का क्या होगा , है के नई...?'

"यार क्यूँ पका रहे हो, कसम से सर दर्द करने लगा है मेरा..."

'यूँ की अब आप मुझे दफा हो जा बोल रहे हो...?'

"यस फाइनली यू गॉट इट"

'वो तो ठीक है पर आपने मेरी बकरी के आगे ईंट क्यों रखी है, देखो हमारी बकरी थोड़ा नाजुक मिजाज की है, उसको लग वग गई ना तो तलवारे चल जाएंगी तलवारें...'

"????????....कौनसी बकरी कौनसी ईंट, बोला न की सर मत खाओ..."

'अरे अभी अभी तो ...बुजुर्गों ने ......फरमाया...की अपने पैरों के ऊपर........हे भगवान ये मेरे गाने भी न जब देखो बिना बताए चल जाते है ,...छोडो वो आपने ही तो बोला की यू गॉट इट... यू मने तुम यानि मैं गॉट मतलब बकरी और इट तो ईंट ही होती है, माना की अंग्रेजी नहीं आती पर इतना भी बुरा नहीं हूँ मैं दसवीं में पुरे 44 नम्बर आए थे अंग्रेजी में...😂😂😂😂😂😂😂  आप किसी को बताओ नहीं तो एक बात बोलूं , वो क्या है न की उस 44 में से 3 नम्बर की नकल मारी थी मैंने....😂😂😂😂 '

"यू नो, तुम सच में पागल हो..."

'हाँ जी आप भी बोल लो , पर उसमे गलत ही क्या है, सब के सब पागल हैं बस मेरी तरह ढीठ बनके मानता कोई कोई ही है....कोई बिजनेस के लिए पागल है तो कोई पैसे के लिए, कोई लड़का/लड़की के लिए पागल है तो कोई सत्ता के लिए, कोई नशे के लिए पागल है....मेरा क्या है मैं तो पागलपन के लिए पागल हूँ, वैसे आप ने बहुत समझदारी ट्राई की है न.... कभी मेरी तरह पागलपन ट्राई करो ...बाय गॉड की कसम बहुत मज़ा आएगा...'

"हाहाहा अच्छा....? हम्म तो तुम कभी कभी समझदार भी हो जाते हो हाँ....सुनो, तुम जो भी हो....अभी के लिए इतना काफी है,,,वरना मैं सच में पागल हो जाऊँगी... तुम हो क्या यार....कहाँ से आए हो क्यूँ आए हो....पर जो भी हो जहाँ से भी आए हो कभी खुद को बदलना नहीं, जैसे भी हो बहुत अच्छे हो.... एंड वन मोर थिंग...आई लाइक योर पागलपंती...बाय फॉर नाउ"

'हंसते हंसते कट जाएं रस्ते,
ज़िन्दगी यूँ ही चलती रहे,
ख़ुशी मिले या गम बदलेंगे ना हम,
दुनिया चाहे बदलती रहे......बाय बाय दिलबरा.....'

***

'अजी चुन्नू की माँ सुनती हो...? हे म्हारा राम जी कहाँ चली जाती है ये छोरी भी, ओजी लाइट जल रही आपके कमरे में...'

"कोनसी लाइट ? और ये चुन्नू की माँ का क्या मतलब....कौन चुन्नू ...और यहां उसकी माँ कौन है बताना जरा....?😬"

'ओ तेरी गुस्सा ? बताता हूँ यारा...पर उससे पहले.....श्री श्री 1008 श्री धर्मेंद्र जी महाराज ने फरमाया है की ' कोई हसीना जब रूठ जा ती है तो, है तो और भी हसीन हो जाती है...., उसके आगे स्टेशन गाड़ी और भी कुछ है पर वो याद नहीं आ रहा...हाँ तो हम कहाँ थे...मेरा मतलब तुम कुछ पूछ रही थी ना..ऊप्स आपको तुम बोला...हे भगवान इसके लिए मुझे नर्क में भी जगह मत देना...मुझे इसी के साथ स्वर्ग में रखना, नरक इसको सूट नहीं करेगा और अकेले में मेरा मन नहीं लगेगा....😂😂😂😂😂😂, वैसे लाइट से मेरा मतलब उस ग्रीन बत्ती से था जो तुम्हारे नाम के साथ जल रही है...😊

"हाहाहा ओ माय गॉश, किधर की बातें किधर ले जाते हो, बातें न बनाओ, बताओ ये चुन्नू का क्या चक्कर है....?"

'अरे वो कुछ भी नही, मेरा जब बेटा होगा तो उसका नाम मैं चुन्नू रखूंगा...तुम्हे कोई एतराज़ तो नहीं....?'

"मुझे क्यों एतराज़ होने लगा , तुम चाहे चुन्नू रखना मुन्नू रखना या कुछ भी रखना तुम जानो, मुझे उससे क्या.."

'सच में ? पक्का तुम्हे कोई प्रॉब्लम नहीं ना? देखो फिर मुझे बाद में चिक चिक नही चाहिए...और सुनो चुन्नू को मैं हिंदी मीडियम में पढ़ाऊंगा, फिर ये सुनने को मिला न की चुन्नू को इंग्लिश मीडियम में भेजो अगेरा वगैरा.. तो यू जानती न की मुझसे बुरा तो यूँ भी इस पृथ्वी लोक में कोई नहीं है...'

"तुम पागल हो , कुछ भी बोलते हो....मुझे तुमसे या तुम्हारे उस होने वाले चुन्नू से क्या लेना देना...हिंदी पढ़ाओ या मराठी मुझे क्या...."

'हे भगवान कैसी माँ है ये, बच्चे की जरा भी परवाह नहीं, देखो तो '

"ओ हेल्लो, क्या था ये , फोन में घुस के चमाट लगाउंगी ओके"

'तब तो बहुत बुरा लगेगा न, सब कहेंगे लुगाई से मार खा ली, अच्छा ठीक है तुम जीती फिर से, मैं हारा'

"यार तुम चीज क्या हो आखिर, कुछ समझ नहीं आता, कुछ भी बोलने लगते हो और सुनो ये प्रोफाइल पर क्या बना रखा है , कब से फालतू की बकबक किए जा रहे हो, अपने बारे में बताओ कुछ"

'मेरे बारे में , अम्म्म क्या बताऊं यार , एक्चुअली बताने जैसा कुछ है भी नहीं, मैं तन्मय हूँ बोले तो 'लीन', अभी तुमसे बातों कम शरारतों में लीन हूँ , छोटे शहर से हूँ, छोटा सा नाम, छोटे छोटे सपने , छोटी छोटी उम्मीदें और तो और बातें भी बड़ी बड़ी करनी नही आती , इत्ती बार छोटा बोला है लग रहा जैसे अब तुम मेरा नाम छुट्टन रखने वाली हो 😂😂😂😂😂'

"यू आर जस्ट टू मच😂😂😂😂😂, हेव टू गो नाउ....सी या..."

क्रमशः

#जयश्रीकृष्ण

(फेसबुक पर धारावाहिक कथाओं का दौर चल रहा है, मौका देख कर हम भी अपना कुछ चेपने की फ़िराक में थे, ये झुमरू कथा आपको पसंद आई तो ठीक है वरना बेझिझक बोल देना, अपन क्रमशः पर इरेजर चला देंगे सिम्पल 😊)

©अरुण

🙏🙏🙏🙏🙏 प्रार्थना ♠♠♠♠♠


पापा ने आज भी पैसे नही दिए, गंदे पापा। मैं कौनसा चॉकलेट के लिए मांग रहा, स्कूल में रोज कचरा होता है फीस को लेकर,रोज क्लास में मुझ अकेले को खड़ा होना पड़ता है,सब कितना हंसते होंगे मुझ पर, स्कूल की फीस ही तो मांगी कभी रानू की तरह जिद्द भी नहीं करता मैं तो कि मुझे भी अठन्नी दो । माँ कहती है मैं बड़ा हो गया, पर क्या सच में ? वैसे बड़ा तो हूँ ही, रानू से , एक बिलांग से थोड़ा सा कम। वो भी तो सात साल की है पता नही कब अक्ल आएगी। पापा पैसे दो दो दो की जिद्द एक बार शुरू की तो मानती ही कहाँ है। और हर बात में वो ही तो बराबरी करती है कि मुझे पेंसिल मिली तो उसे भी चाहिए, इरेजर भी चाहिए साथ में, वैसे दिमाग तो तेज़ है इसका, पर पढ़ने के बजाय बातों और खेलने में ज्यादा लगाती है। थोड़ा सा भी और गौर करें तो ये ही फर्स्ट आएगी पक्का। पर क्या होगा फर्स्ट आकर भी, माँ ने मुझे भी तो बोला था कि फर्स्ट आऊंगा तो साइकिल ला देंगे, ला दी क्या? हुंह कुछ नही होना फर्स्ट आकर . अरे पर मैं ये सब क्यों सोच रहा हूँ स्कूल भी तो जाना है और देर हो रही है, है ना.

"रानू, ओ रानू चल न जल्दी . रोज लेट हो जाते हैं तेरी वजह से "

"मेरी नहीं तुम्हारी वजह से, खुद तो नहाए नही थे आलसी"

"अरे पर तुम ही तो बाल्टी पर कब्ज़ा कर के बैठ जाती हो पहले, और अब कित्ती देर से खेल कौन रहा था?"

"मुझे नहीं पता, तुम ही करते हो लेट, मैं नहीं"

"गुस्सा मत दिला नही तो मैं चमाट लगाऊंगा"

"बड़े आए, जैसे मैं चुप चाप खा लेने वाली हूँ, ये दांत देखे हैं मेरे , कितने तीखे हैं...इतना जोर से काटूंगी ना की माँ के पास भागोगे सीधे शिकायत लगाने.....हीहीही"

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स्कूल के पास की दुकान में भीड़ लगी है, सब कुछ मिलता है यहाँ रंग बिरंगी मीठी गोलियां, चॉकलेट, आम पापड़ से लेकर चूरन तक, और तो इमली भी. पर मैं इमली नही खाता लड़कियां खाती हैं, पहले तो मैं भी खा ही लिया करता था पर आशु बोल रहा था की इमली खाने से मैं भी लड़की बन जाऊंगा, मुझे नही बनना लड़की वड़की, अच्छा किया जो बंद कर दिया क्या पता किसी सुबह मैं उठता और......... छी कितना लगता मैं...रिब्बन डाल कर चोटी बनाना पड़ता वो अलग. माँ रानू की चोटी भी कितना ज़ोर लगा कर बनाती हैं मानो गुस्सा निकाल रही हैं, फिर मैं भी इसी की तरह चिल्लाता .......... "उई माँ"

"क्या हुआ, चिल्लाए क्यूँ?"

"हेहेहे कुछ नही बस ऐसे ही कांटा लग गया था..... :)"

मेरी क्लास के कुछ बच्चे 'खरीददारी' कर स्कूल की और प्रस्थान कर रहे, बटड़ बटड़ की आवाजें आ रही इनके मुंह से, पता है नमूनों की कुछ खा रहे हो , इसमें इतना इतराने की क्या बात है ? जानबूझ के आवाजे निकाल रहे हो न? सब पता है मुझे . हंस तो ऐसे रहे जैसे पता नही कौनसा राजभोग खा लिया हो, और इस सिम्मी को तो देखो चूरन कैसे हाथ पर डाल के चाट चाट कर खा रही है, ऐसे तो गंदे बच्चे करते है, पर ये तो है ही गंदी बच्ची, मैंने न जाने कितनी बार इसका होमवर्क किया है तो इसका फर्ज नही बनता की मुझे भी थोड़ा चूर.... नही नही मुझे नही लेना इससे कुछ भी... मैं जब बड़ा हो जाऊंगा तो ढेर सारा चूरन लाऊँगा, इतना सारा की रोज कटोरा भर भर के मैं और रानू खाएंगे तब भी खत्म नही होगा, पर मैं इसकी तरह नहीं हूँ थोड़ा इसे भी दे दूंगा. हम्म तब इसे अपनी गलती का अहसास जरूर होगा, न भी हो पर मुझे तो अच्छा ही करना है न, माँ ने भी यही कहा था कुछ करना हो तो ऐसा करो कि लोग तुमसे प्रेरणा लें की हमे भी 'राजन' जैसा बनना है.

स्कूल आ गया, मैं  दरवाजे पर झुक कर थोड़ी माटी उठा शीश पर लगाता हूँ, रानू सीधे चली आ रही मुँह उठाए, न जाने कब अक्ल आएगी, कुछ याद नहीं रहता इसको माँ ने कितना समझाया था स्कूल किसी मंदिर से कम नहीं होता, और गुरुजन भी देवता जैसे ही होते हैं, ये माटी ही हमे सोना बनाएगी देख लेना. गुरूजी खड़े है उनके चरण छूता हूँ पर वो कोई ध्यान नहीं देते, कैसे देंगे न जाने कितने बच्चे उनके चरण छूते रहते हैं सब पर ध्यान कोई कैसे देगा भला, और फिर वो बात भी तो कर रहे थे किसी से ,पता नहीं कौन है पहले कभी नहीं देखा इनको , खैर जो भी हो मुझे क्या, पर बड़े हैं ये भी इनके भी चरण छूने चाहिए थे मुझे, रानू कहाँ है? अरे वो गई अपनी सहेलियों के साथ जाते जाते वापस लौट आता हूँ, उनके भी पैर छुए, चौंक गए वो शायद, मेरी और देख कर मुस्कुराए क्या नाम है बेटा?

'जी राजन'

'राजन !? अरे वाह बड़ाप्यारा नाम है, कौनसी क्लास में हो राजन?'

'जी तीसरी क्लास में..'

गुरूजी बीच में ही बोल पड़े,' तुम क्लास में जाओ राजन '

'जी गुरु जी...'

मैं क्लास में आ गया. अपना यूरिया के थैले से बना स्कूल बैग सामने के डेस्क पर रख दिया, अब प्रार्थना होगी हमेशा की तरह, रोज मुझसे बुलवाते हैं गुरु जी, हाँ मुझी से, 8 वीं की लड़कियों ने उस एक दिन प्रार्थना बोली थी जब मुझे बुखार हुआ था, गुरूजी उन लड़कियों से कह रहे थे की अकेला राजन तुम सब से बुलंद स्वर में बोलता है और सुर में भी, वो चिढ कर मुझे ही सुना कर चली गई, पर मैंने किया क्या ? यही समझ नही पा रहा... प्रार्थना की घँटी बज उठी....टन टन टन.... पंक्तिया सजने लगी है, सब बच्चे कतारबद्ध कितने अच्छे लगते हैं न, जैसे दीवाली पर पंक्तियों में जगमगाते दिए , मुझे भी चलना चाहिए इससे पहले की सावधान विश्राम की प्रक्रिया शुरू हो...सरस्वती मैया की तस्वीर के आगे दीप जलाना शुरू करने के साथ ही मैं भी शुरू हो जाता हूँ

दीप ज्योति परम ज्योति ,दीप ज्योति जनार्दन:
दीपो हरतु मे पापं, दीप ज्योति नमोस्तुते !

...........और फिर प्रार्थना

' हमको मन की शक्ति देना मन विजय करें
दूसरों की जय से पहले खुद को जय करें .'

हाँ माँ यही तो सिखाती है, मन को जीतना करना सीखो , पर आज प्रार्थना में मन नही लग रहा, कुछ रोना जैसा आ रहा, भगवान जी रोज आपको प्रार्थना करता हूँ न फिर ऐसा क्यों है ? मेरे पापा फीस क्यों नही दे पाते ? अब थोड़ी देर में फिर से वही सब होगा....फिर से सब हंसेंगे मन ही मन...

'भेदभाव अपने मन से साफ कर सकें,
दूसरों से भूल हो तो माफ़ कर सकें.'

भगवान जी मुझसे क्या गलती हुई है ? अगर हुई भी हो तो प्लीज माफ़ कर दो , मैं तो आपका अच्छा बेटा हूँ न....

'झूठ से बचे रहें, सच का दम भरें,
दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करें'

हाँ भगवान जी आप सही कहते हो, मैं भी जब बड़ा हो जाऊंगा तब खूब सारे पैसे कमाऊंगा, सारे साल की फीस एक साथ भर दूंगा...

प्रार्थना समाप्त हुई, मैं भी एक लाइन में खड़ा हूँ सबसे पीछे, मुझे आगे कौन खड़ा होने देगा भला, अरे ये तो वही हैं सुबह जो गुरूजी के पास खड़े थे, अरे.... चुप..... चुप.... सुनो गुरूजी कुछ बोल रहे हैं ,' प्यारे बच्चों, हर गुरु का ये सपना होता है की उसके सभी शिष्य आगे बढ़े कुछ ऐसा करें जिन पर हम ही नही पूरा राष्ट्र गर्व कर सके, पर एक निजी संस्था की कुछ अपनी आर्थिक मजबूरियाँ होती हैं कई बार हम चाहे तब भी हमारी ये मजबूरियाँ हमें वो करने से रोक देती हैं, खैर....पिछले महीने एक प्रतियोगिता का आयोजन हुआ जिनके आयोजक श्री आशुतोष हमारे साथ हैं, मुझे ये बताते हुए बड़ा हर्ष हो रहा है की इस प्रतियोगिता के प्राथमिक वर्ग में हमारे विद्यालय के उस होनहार बालक का चयन हुआ है जिसे इसकी सर्वाधिक आवश्यकता भी थी, जब मैंने श्री आशुतोष से उक्त छात्र के विषय में चर्चा की तो उन्होंने बड़ी सदाशयता का परिचय देते हुए इस छात्र के लिए शिक्षा की सम्पूर्ण व्यवस्था का दायित्व बड़े आग्रह से ले लिया, आप सबको उस छात्र का नाम जानने की उत्सुकता हो रही होगी, आप सब की तालियों के बीच मैं मंच पर आमंत्रित करता हूँ कक्षा 3 से 'राजन' को.....

तालियाँ गूंज उठी हैं चारो और, मैं जड़वत बैठा हूँ, गुरूजी ने फिर से पुकारा उठो राजन...उठो..तुम्हारा ही नाम पुकारा है मैंने....जाने क्यों मेरी आँखों में आँसू बह चले हैं....मंच पर खड़े सज्जन से कहा सर मैं जब बड़ा हो जाऊंगा मैं भी ऐसा ही कुछ जरूर करूँगा.....श्री आशुतोष मुस्कुरा रहे हैं मुझे प्यार से निहारते हुए , मैं ऊपर देखता हूँ भगवान... माँ सच कहती है तुम बच्चों की प्रार्थना सबसे पहले सुनते हो.... माँ सच कहती है माँ सब सच कहती हैं.

#जयश्रीकृष्ण

©अरुण

💕💕💕💕💕 पहली-पहली बार बलिए ♠♠♠♠♠ .

माणी की शादी थी, माणी बोले तो जीजी की मोटकी और बेस्ट वाली दोस्त। तभी तो जीजी डाइरेक्ट लखनऊ से हियाँ आए थे अटेंडेंस लगाने, और कैसे नहीं आते चिठ्ठी पतरी के अलावा फोन पर धमकी देने की सारी कार्यवाही माणी ने कर डाली थी। यूँ तो क़ायदे से हमारा माणी को भी जीजी कहना बनता था पर सब उसके लिए यही नाम प्रयोग में लाते थे, यूँ की उसका हमसे भी छोटा भाई भी उसे 'माणी', 'माणो बिल्ली' जैसी संज्ञाओं से विभूषित करता था, तो हम भी माणी को माणी कहें तो हैरानी नहीं होनी चाहिए, कभी कभी तो लगता कि माणी का दूल्हा भी उसे माणी या माणो बिल्ली ही कहेगा, बेस्ट लगता था पुकारने में। माणी को छोड़ मुद्दे की बात पर लौटते है, उसकी शादी, हाँ तो होने जा रही थी न भई। बनियों में एक खास बात होती है साफगोई और मैनेजमेंट, कुछ भी ऐसा जिससे चार पैसे बचने का जुगाड़ हो साफगोई से कह देने में कोई हर्ज नहीं रखते, राजू चाचा,फिल्म वाले नही माणी के अब्बा हुजूर, भी ठहरे ठेठ बनिए, ऊपर से पाक विस्थापित, एक एक चीज मैनेज कर डाली एडवांस में, कहाँ कब किस चीज पर कितना खर्च करना है सब तय था, उसी की एक कड़ी था, अपने होने वाले समधी से मिलकर प्रीतिभोज का संयुक्त आयोजन, खर्चा फिफ्टी फिफ्टी। ये मेरे या मेरे जैसे कइयों के लिए नया प्रयोग था उस समय में, वरना शादी के नाम पर फिजूल खर्ची ही देखते आए हम तो। मस्त आईडिया है न, तुम्हारी भी जय जय हमारी भी जय जय, न तुम हारे न हम हारे 😊, खैर जब इन्विटेशन में पढ़ा तो पता लगा, शादी के लिए होने वाली पार्टी मने खाना पीना गंगानगर में किसी 'मिलन मैरिज पैलेस' नामक स्थान पर होगा। पहली बार ये शब्द सुना , मैरिज के लिए कोई पैलेस भी होता होगा सोचा तक न था वरना अब तक तो जो शादियाँ देखी थीं उनमे तो गाँव के स्कूलों में और शहर की धर्मशाला में ही ठुसमठासी महायज्ञ का आयोजन होते देखा था। पर ये क्या होता है कैसा होता है इस बात पर ज्यादा मग्गज खपाई नहीं की, न तो इतना फालतू दिमाग ही है अपना ऐसी फालतू बातों पर विचार करने के लिए वैसे भी ऐसी कोई मग्गज खपाई वाली उम्र भी नहीं थी तब हमारी, 9 वीं में थे, समझ लो मूँछ की कोपलों ने उगने का विचार ही किया था बस, ढंग से उगी नहीं थी। लगभग पूरा मोहल्ला इंवाइटेड था, यहाँ तक की छोटे छोटे बच्चे भी जाने वाले थे, तो हम जैसे बूढ़े बच्चे कैसे पीछे रह जाते,माँ ने कहा तेरी दीदी और जीजाजी जा रहे है न , पूरा घर थोड़े न रवाना हो लेता है शादी का नाम सुनकर, पर कुछ भी हो, जैसे भी हो हमको भी जाना ही था, हम ही क्यूँ क़ुरबानी दें, तो स्कूल ड्रेस के अलावा जो इकलौती एक्स्ट्रा पार्टी वियर येल्लो चेक बुर्शट और भूरी पेंट वाली ड्रेस थी उसको अनीता आंटी के घर से प्रेस लाकर चकाचक तैयार कर चुके थे। शाम को जब जीजाजी और दीदी तैयार हो रहे थे तो हम भी पेंट में बुशर्ट ठूस कर खड़े हो गए, कुछ बचा भी रहा हो तो दी के पर्स से फेयर एंड लवली और जीजाजी का परफ्यूम रगड़ कर बाकि कमी भी पूरी कर ली। बारात बस से जाने वाली थी, जी बिलकुल गंगानगर 30 किमी पड़ता है इधर से तो, सब मेहमानों के लिए बस का इंतज़ाम किया हुआ था, जब शाम को बस में जीजाजी सवार हुए तो 3x2 बस में 3 वाली सीट पर खिड़की वाली सीट पर हमें ढिठाई से उनका इंतजार करते पाया, क्या करते, ले जाना ही पड़ा।

शाम को करीब 7 बजे सब वहां पहुँच गए, "मैरिज पैलेस" वाकई किसी महल से कम नहीं था, दरव्जे पे दोनों और 2 अधपकी खड़ूस युवतियाँ सफेदी पोते चेहरे पर नकली मुस्कान के साथ आगन्तुकों पर इत्र जैसा कुछ छिड़क रही थी। पहली बार ऐसा ताम झाम देख रहे थे, युवतियां भले ही खुबसूरत नही थी पर सुहावनी लग रही थी, सो इत्र का फव्वारा पड़ते ही " हम आपके हैं कौन " की निशा की तरह मन ही मन "अहा" बजाते हम आगे बढ़ गए। लम्बा चौड़ा शामियाना जिसमे ढेर सारी सफेद और लाल कुर्सियों की कतारें हमारे स्वागत में बिछी थी। एक वेटर आया कोल्ड ड्रिंक की ट्रे सज़ा कर, मुझसे बड़े प्यार और अदब से बोला,' लीजिए सर', सर सुनते ही दिल धिन चक धिंचक कर उठा, धीरे होले बहुत चुपके से एक गिलास जो किनारे तक भरा हुआ था उठा लिया और वेटर की और देखा, वेटर की आँखे कह रही थी, 'वाह सर वाह, आप तो महान हो, निहाल कर दिया आपने तो'। फिर एक और आया पनीर के भुने टुकड़े लिए जिनमे छोटी छोटी तीलियाँ लगी थी साथ ही सॉस भी था, पेंट की जेब में नेपकिन लटकाए आकर सामने खड़ा हो गया। उसे क्या पता की हम नेपकिन पहली बार देख रहे है, उसकी जेब में  लटकते नेपकिन से बिना उन्हें बाहर निकाले ही हाथ पोंछ डाले। 4 तीली विद पनीर उठा कर कहा अब तुम जाओ सॉस नहीं मांगता अपन को। वेटर को पता नही कैसा लगा होगा पर वो बस मुस्कुराया और आगे बढ़ गया। दीदी एंड जीजाजी मैरिज पैलेस के किसी अदर पार्ट में जिधर एक्चुअल शादी की रस्मे हो रही थी वहाँ गये थे पर अपना मन तो पूरी तरह इधर ही रमा हुआ था। सब कुछ तो है इधर खाना एंड गाना एंड भीड़ एंड भड़का। गाने से याद आया जब हमने मारी एंट्रीयाँ तो घण्टियाँ कहीं नहीं बजी पर सामने के स्टेज पर एक आर्केस्ट्रा जिसमे एक बैंड अपना बाज़ा बजाने को तैयार नज़र आया। कुछ देर तक वे सिर्फ इंस्ट्रूमेंट बजाते रहे, एंड लेट मी टेल यू देट मोगैम्बो खुश हुआ रियली। मज़ा आ रहा था, फिर एक लंबे बालों वाला आया और माइक संभाल लिया, वन टू थ्री फ़ॉर राँझा मियाँ छडो यारी चंगी नाईयो इश्क बीमारी, गाने लगा। भगवान भला करे उसका जिसने गाना बदलने को बोला, आवाज़ बुरी नहीं थी पर एकदम से जो धमधम होने लगी किसी को भी नही अच्छी लगी। हल्के हल्के इंस्ट्रुमेंटल म्यूजिक के साथ लम्बे बालों वाला 'गुलाबी आँखे जो तेरी देखी, शराबी ये दिल हो गया', इधर ये गाना शुरू हुआ उधर वो आई, वो कौन ? क्या बताऊँ, ल् ल् ल् ला, ला ल्ला ला ला ला ला, ला ल्ला ला ला ल्ला, मैं लुट गया मान के दिल का कहा मैं कहीं का ना रहा, बिलकुल दूध सी सफेद, रुई सी कोमल, स्काई ब्लू रंग की केप्री और झक सफेद टॉप पहने वो पैलेस में प्रविष्ठ हुई, ल् ल् ल् ला, ला ल्ला ला ला ला ला, ला ल्ला ला ला ल्ला, दिल में मेरे, ख्वाब तेरे, तस्वीरे जैसे दीवार पे, वो अपनी 2 सहेलियों के साथ थी, माँ कसम उन दोनों में से किसी की तरफ एक नज़र उठा कर नहीं देखा माँ बदौलत ने, वो तीनो आईं और मुझसे पीछे वाली 1 कतार छोड़ तीसरी कतार में कुर्सियों पर विराजमान हो गई। मेरी नज़र वाकई चिपक गई थी उससे, इसीलिए जब से वो भीतर दाखिल हुई तब से कुर्सी पर तशरीफ़ रखने तक हर दिशा में उसके साथ ही घूमती चली गई और अब पूरा 180° घूम कर ढिठाई, बेशर्मी एंड प्यार से उसे निहार रही थी। ल् ल् ल् ला, ला ल्ला ला ला ला ला, ला ल्ला ला ला ल्ला, गाना लगातार चल रहा था, हालाँकि उसकी आँखे काली थी पर, हुआ ये जादू तेरी आँखों का, ये मेरा कातिल हो गया, संभालो मुझको ओ मेरे यारों, सम्भलना मुश्किल हो गया। आखिर , फाइनली लम्बे इंतज़ार के बाद ही सही पर कृपा हुई, उसने भी देखा, गाना चेंज, "तुमने मुझको देखा, मैंने तुमको देखा ऐसे, हम तुम सनम, सातों जन्म, मिलते रहे हो जैसे", गाना पूरा नहीं हुआ पर उसने नज़रें घुमा ली। मैं चाहे जितना मर्जी लोगों से कहता फिरूँ की मैं देखने की चीज हूँ आहाँ, पर सच्चाई वही थी जो अब सामने आ रही थी, ऐसा कुछ खास नहीं है इस थोबड़े में, मुँह उतर गया, पर " हम तेरे बिन कहीं रह नहीं पाते, तुम नहीं आते तो हम मर जाते" , नज़र अब भी उसी की और थी बिना ये विचार किए की पैलेस में और लोग भी हैं न जाने वो क्या क्या सोच रहे होंगे। अचानक नज़रे उठी फिर से मिली, दिल की कलियां खिल गई, अटलीस्ट फ्रॉम माय साइड, उसने हैरानी से मुझे देखा, ये पागल तो नहीं, ऐसे क्यों देख रहा है, अपनी सहेली से आइस क्रीम चेपते चेपते मेरी और इशारा कर कुछ कहा। सबने देखा फिर हंस दी। वो भुने पनीर वाला वेटर आया और लड़कियों के सामने खड़ा हो गया, नेटवर्क प्रॉब्लम, उफ्फ्फ , अरे भाई ऐसे भी कोई करता है क्या, तेरे 4 टुकड़े के पैसे ले लियो पर गुरु सामने से हट जा, तुझे खुदा का वास्ता। पर गरीब की कोई कब सुनता है वो खड़ा रहा तब तक जब तक उन्हें सर्व न कर दिया, मेरे वाली की सहेली ने एक नेपकिन धीरे से निकाला खोला फिर उस पर आहिस्ता आहिस्ता 2-2 तीलियाँ सबके हिस्से की उठाई उस पर आराम से सॉस डाला, अब क्या नहलाओगी इनको मन ही मन मैंने कहा। वेटर के जाते ही वो आराम से अपने खाने में मशगूल हो गई। तो हेल्लो हेल्लो माइक चेक, ऐसे थोड़े न होता है, ओ हेल्लो इधर इधर, देखो न यार प्लीज। अचानक खाते खाते उसकी नज़र फिर से उठी,और वो हँस दी, ल् ल् ल् ला, ला ल्ला ला ला ला ला, ला ल्ला ला ला ल्ला, जरा सा हंस के जो तूने देखा मैं तेरा बिस्मिल हो गया, गुलाबी आँखे जो तेरी देखी.... शरआबी ये दिल हो गया, वो उठी फिर उसकी सहेलियाँ भी उठी और उठकर चल दी, इधर उधर के भ्रमण के लिए, अरे तो मैं बैठा क्या कर रहा हूँ, हियर आई कम बेबे, उठने को हुआ की अचानक जीजाजी का हाथ कंधे पे, क्या हो रहा है? " अ आ कु कुछ नही जीजाजी", कैसे बताऊँ की जीजाजी प्यार की कश्ती में, लहरों की मस्ती में, पवन के शोर शोर में, चले हम जोर जोर में, गगन से दूर, दूर से याद आया,अरे वो चली जाएगी, कहाँ है वो, आँखे उसे ढूंढ रही थी, जीजाजी बोले किसे देख रहे हो? मैंने कहा मैं अभी आया जीजाजी, पूरा पैलेस छान मारा पर वो कहीं नहीं मिली😢, कहीं वो चली तो नही गई ? नहींईईई, फिर दौड़ कर पैलेस के दरव्जे तक आया, देखा सच में वो जा रही थी मारुती ओमनी वेन पर सवार होकर, मुझे देखा तो फिर से मुस्कुराई, पर किसी ने भीतर से दरवाजा खींच कर बंद कर दिया। वैन चल दी, न जाने किस ओर, जाती हुई वैन का शीशा खुला एक सफेद हाथ बाय बाय करता सा लहरा रहा था।
#जयश्रीकृष्ण
©अरुण

👧👩👱👰👵 शामली ♠♠♠♠♠ .

शामली बहुत खुश थी आज, आखिर उसके काका ने उसको भी नया फोन ला दिया। कब से कह रही थी काका से, आप मुझे अपनी बेटी मानते ही नहीं, सोनूड़े ने फोन लिया उसे तो मना नही किया कभी, तो क्या हुआ अगर वो कमाता है, उसे मौका मिले तो वो भी कमा सकती है, शायद सोनूड़े से भी ज्यादा, लड़का-लड़की एक समान है उसकी मैडम बता रही थी इस्कूल में, पढ़ा भी है उसने, तो भाई को चाहिए तो उसे क्यूँ नहीं चाहिए बताओ, उसके लिए तो काम की चीज और मेरी बारी आते ही बेकार? चाहिए तो चाहिए बोल दिया था काका से, मैं भी अपनी सहेलियों मीनूड़ी और रेखली से बातें करूँगी काम की। नया फोन हाथ में आया तो दौड़ पड़ी दिखाने अपनी सहेलियों को।

शामली, असल नाम श्यामा, उम्र 13 साल, शहर से 3 किमी दूर ढाणी में रहती है, उसके पिता जिन्हें वो काका कहती है खेती करते हैं। खुद के पास 4 बीघा जमीन है अब इतने से गुजर नहीं होती तो काम चलाने को कुछ जमीन ठेके पर ले लेते हैं। कुल मिलाकर हाड तोड़ मेहनत करने वाले श्रमजीवी हैं। माँ किस चिड़िया को कहते हैं नहीं पता, कुछ याद नही शायद 3 साल की रही होगी जब ये माँ नाम की चिड़िया उड़कर न जाने कहाँ किस दुनिया में चली गई, काका से पूछा था कई बार पर वो बस चुपचाप भाव और संज्ञाशून्य से हो जाते कभी कोई प्रत्युत्तर न देते, एक बड़ा भाई है सुरेंद्र उर्फ़ सोनू उर्फ़ सोनूड़ा, प्लम्बर है, 10 वीं में फेल हो गया तो काका ने काम पर लगा दिया, यूँ भी उसे पढ़ाई को लेकर विशेष उत्साह जैसी कोई बात नज़र नहीं आती थी। कौनसा सभी पढ़े लिखे कलेक्टर बन जाते है, आज वो ठीक ठाक कमा खा रहा है तो अच्छा ही है। एक छोटी बहन भी है, कहने को तो नाम सुनयना है पर वो उसे उसके भूरे रूखे बालों की वजह से भूरती कहा करती है। 10 साल की घोड़ी हो गई है पर अभी गुड्डे गुड्डियों के ब्याह रचाने और घरौंदे बनाने से भी नहीं उबर पाई है, तो पते की बात ये है कि उसकी जिससे गुड वाली जमे ऐसा घर में कोई भी नहीं। सारे घर का काम शामली अकेले करती है पर जब फोन की बात आई तो काका बस बहाने बनाए जा रहे थे। पर आज आखिर सत्य की यानि उसी की जीत हुई।

शामली अपना फोन मीनुड़ी को दिखा रही थी, मीनू, उम्र 14 वर्ष, घर की इकलौती बेटी थी, बहुत लाडली और थोड़ी नकचढ़ी, इकलौते होने से ज्यादातर उसकी हर मांग पूरी हो जाया करती, ये फोन वोन सबसे पहले उसी के पास आया था, उसे सब पता होगा इसलिए उसके पास आई थी।

 'देख देख कितना अच्छा है ना, रेखली वाला फोन तो छोटा सा है, बोदा हो गया है ,पटक पटक के हालत खराब कर रखी है बेचारे की, गर्दन पर टेप लगा के जिन्दा रखा है, आवाज़ भी घर्र घर्र करती है उसमें, सोनूड़ा बोल रहा था ये एंड्रॉयड है, फिल्म भी चलती है इसमें, गाने भी चलते हैं।'

'अरे ये आजकल सभी नए फोन में होता है। चल तेरा व्हाट्सएप्प अकाउंट बनाती हूँ।'

'वो क्या होता है?'

'अरे बड़ी मजेदार चीज है, बातें कर सकते हैं, अपनी फोटो और वीडियो कुछ भी शेयर कर सकते हैं।'

'अच्छा !? तब ठीक है, अब खूब बातें करेंगे।😊😊'

और वाकई शुरू हो गई कभी न खत्म होने वाली बातें, साथ ही सूत्र की तरह जुड़ते ग्रुप्स से सहेलियों का कारवां भी बढ़ता गया, और जुड़ गया आरुष, आरुष उसके भाई का दोस्त था उस के साथ कई बार घर आया करता था। न जाने कहाँ से और कैसे नम्बर लिया उसका, खूब बातें बनानी आती थी उसको शामली के बालमन को बहलाना तो और भी आसान लगा उसे। शामली को उसका नाम बहुत पसंद था, अनजान नम्बर के लुभावने मैसेज का रिप्लाई तभी किया था जब ये पता लगा की मैसेज भेजने वाला आरुष है। शामली अपनी उम्र के अनुसार ही मन से भी बच्ची थी पर आरुष नहीं, वो उसे लगातार बातें करता कभी घर परिवार के बारे में, कभी स्कूल के बारे में तो कभी उसकी सहेलियों के बारे में, फिर एक दिन आखिर उसने अपना प्रेम प्रस्ताव  भी शामली के सामने रख दिया। कच्ची उम्र के कल्पनाशील मन को लगा जैसे वो इसी का तो इंतज़ार कर रही थी। आरुष धीरे धीरे और खुलता जा रहा था, मैसेज की शृंखला में अब कुछ मैसेज 'वैसे वाले' भी होते, अजीब लगता श्यामा को पर वो उन पर ध्यान न देने की कोशिश करती। फिर 'वैसे वाले' वीडियो भी आने लगे, यक्क् गन्दी, मन कसैला हो गया, क्या है ये ? उसने पूछा था। आरुष बोला, पगली इसे ही तो प्यार कहते है। सब प्यार करने वाले करते हैं,  बिना इसके हमारा प्यार भी गहरा नहीं होगा। शामली अजीब सी उधेड़ बुन में थी, बस चुप हो रही।

एक दिन जब स्कूल से लौट रही थी, तो उसकी ढाणी से कुछ पहले उसे आरुष मिला। अच्छा लगा था उसे मिलकर, प्यार जो करती थी उससे। संकोच हुआ पर आरुष की प्यार भरी नजरों में खो कर सरसों की फसल में बैठ बातें करने लगी। आरुष कितना अच्छा है, कितना सुन्दर, मुझे कितना प्यार भी करता है, हे भगवान ये पल यहीं थम जाए, ये बस यूँ ही चलता रहे, मैं यूँ ही खोई रहूँ आरुष की आँखों में। इसी स्वप्न के बीच आरुष ने उसे पहली बार चूम लिया था, बहुत लाज आ रही थी, अपने ही हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया, और आरुष ने खींच लिया था अपने पास और वो किसी गुड़िया की तरह उसके आगोश में समा गई, फिर जो हुआ वो किसी 'वैसे वाले' वीडियो जैसा था यक्क , गंदा और दर्दनाक भी, बस आरुष को वही अच्छा लगता है यही सोच पड़ी रही। आरुष वाकई उससे बहुत खुश था,ये सब इतना इजी हो जाएगा उसे भी कहाँ पता था। तभी तो अब ये उसका नित्य कर्म हो गया, रोज उसे वहीं मिलता, वही करता जिसे वो प्यार कहा करता था, और चला जाता। पर एक दिन उन दोनों को सोनूड़े ने देख लिया, खूब झगड़ा हुआ आरुष के साथ उसका, शामली ने तब भी आरुष का ही साथ दिया था। क्या गलत किया ? प्यार किया न तो क्या हुआ? प्यार करना कोई जुर्म है क्या? आरुष सोनूड़े से छूट कर भाग गया। शामली की खूब पिटाई हुई, स्कूल जाना बंद हो गया। सिर्फ उसका ही नहीं सुनयना का भी। एक रोज मौका पाकर शामली भी उड़ गई चिड़िया की तरह, ठीक वैसे जैसे कभी उसकी माँ भी उड़ कर चली गई थी, जिसकी वजह से उसके पिता आजतक एक चुप्पी को झेलने को विवश थे। बदनामी झेल पाना हर किसी के बस का कहाँ होता है, शामली ने सुना की काका ने अपने आप को टांग दिया था पंखे से, फिर सुना सोनुड़ा न जाने कहाँ चला गया किसी को कुछ भी नहीं पता। भूरती की चिंता होने लगी थी पर किसी ने बताया कि काका ने खुद ही उसका गला घोंट के मार डाला था। बहुत रोना आया था उसे, बहुत रोना, पर कुछ भी हो उसके साथ उसका प्यार उसका आरुष तो था ही, उड़कर उसी के पास तो आ गई थी।

एक दिन आरुष बोला, अब हम यहाँ नहीं रहेंगे, मेरी तो सिर्फ तुम हो, और  तुम्हारा भी अब कोई नहीं यहाँ। उसे लेकर हरियाणा चला गया अनवर चचा के पास, जी हाँ वो भी चौंकी थी ये नाम सुन कर, तो आरुष ने बताया था कि वो बहुत अच्छे लोग हैं, जब तक हमे रहने का कोई और ठिकाना नही मिलता यही रहेंगे फिर अपनी छोटी सी प्यारी सी दुनिया बसाएंगे जहाँ बस खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी, गम एक भी नही।

'अच्छा सुनो मैं अभी खाने पीने का सामान लेकर वापस आता हूँ। '  आरुष ने कहा था।

वो चला गया, फिर कभी न लौट कर आने के लिए। वो आरुष का इंतज़ार कर रही थी तभी अनवर चचा आए उससे मार पीट की और वो किया जो उन्हें बिलकुल नही करना चाहिए था। वो रोइ गिड़गिड़ाई धमकी भी दी की आरुष को बताएगी सब, और तब उसे पता लगा था कि उसका आरुष उसका अपना आरुष उसे यहाँ छोड़ कर नहीं बेच कर गया है , बस नाम के लिए अनवर चचा ने अपने सबसे छोटे और पागल बेटे आसिफ से साथ उसका निकाह पढ़वा दिया, पर हकीकत में घर के सभी पुरुष मौका मिलने पर शामली से सलमा बनी जिन्दा लाश को नोच नोच खाते हैं। शामली रोज वहाँ जी तोड़ काम करती है, भाग कर जाए भी तो कहाँ जाए , किसके पास, जानती है कि कोई लौट कर नहीं आएगा उसके लिए इसलिए किसी का कोई इंतज़ार नहीं उसकी भावशून्य आँखों में।

और सावधान , क्योंकि आरुष खान अब किसी और शामली की तलाश में है।

#जयश्रीकृष्ण

©अरुण

Rajpurohit-arun.blogspot.com

💢💢💢💢💢 हैप्पी न्यू ईयर ♠♠♠♠♠

कॉलेज का प्रथम वर्ष, घर से दूर रहने का पहला अनुभव, और इस अनुभव से साक्षात् हो रहे हम तीन भेरी मच एक्साइटेड फेल्लोज, हम यानि मैं ,अजय और 'माही'। ओ हेल्लो भाई साहब, 'माही' नाम पर एक्स्ट्रा ध्यान लगाने से कोई फायदा नहीं, 'माही' मने कोई षोडसी कन्या नहीं है, माही बोले तो महेंद्र, आपकी और हमारी तरह एक खड़ूस मुस्टंडा। हाँ तो ये मुस्टंडा टोली घर से निकलते ही, बहुत दूर चलते ही गंगानगर के पाल हॉस्पिटल के पिछु वाली गली में अपना टेम्परेरी आशियाना मने खोली तलाशने आ पहुँची। गुलशन ने बोला था, अपना डॉ. गुलशन, बोले तो गुल्लू डार्लिंग ने। गेट पर आकर मन ही मन जोर से पढ़ा ह्म्म्म 'नरेश निवास', हाँ लग तो यही रहा है, फिर एक दूसरे को एक विजेता वाली मुस्कान गिफ्ट कर भीतर दाखिल हुए। नरेश निवास, किसी बनिए नरेश का घर था। खुद फर्स्ट फ्लोर पर विराजित इस फैमिली ने नीचे 8 छोटे छोटे कमरे बना कर होस्टल का साइड बिजनेस भी जमा रखा था। बनियाज आर ऑलवेज भेरी कलेवर इन मनी मैटर 😊। वैल, गुल्लू ने सब सेटिंग कर रखी थी हमे बस उसमे फिट होना था। यूँ की हो गए हम भी।

आठ कमरों के भांति भांति के विचित्र प्राणियो में अकेला गुल्लू हमारी ऐज का था बाकि सब सीनियर सिटिज़न , वो खुसट वाले नहीं, समझा करो न स्वीटी, बस 4-5 साल या उससे ज्यादा वाले सीनियर थे। ज्यादातर पंजाब से यहाँ लॉ पढ़ने आए थे, कुछ एम एससी करने। सब बड़ा प्यार करते हम लोग, और अपना ये प्यार विभिन्न प्रकार से यदा कदा जताते भी रहते थे। वन्स देयर वाज़ जब माही टाइप सेंटर पर एक गुटखा छाप गुंडे को पीट आया और नेक्स्ट डे जब सेंटर पर जाते हुए उसकी फट कर होद हो रही थी बिकॉज़ गुटखा मियाँ ने भी कल देख लेने का पूरा पूरा भरोसा दिया था, उस दिन भी हमारी होस्टल पार्टी ने गुटखा और उसकी बाकि की उधार की सुपारियों की चिंदी बिखेर दी थी। 😊😊 एंड रिजल्ट माही बीकेम सेल्फ डिक्लेअरड़ दादा ऑफ़ द सेंटर।

बड़ा मस्ती मज़ाक का माहौल रहता, पर हमारे ये बड़े ..बड़े वो थे, खुद कभी किताब को छुएं भी नहीं पर उनके आने पर हमारी पढ़ाई शुरू मिलनी चाहिए। कुछ भी खाने पीने को घर से लाते या बनाते इन देवताओं को भोग लगाए बिना नसीब न होता। और कोई कितना बनाएगा या लाएगा ? जो भी होता 16 लोगो के चखने में ही चला जाता। और हम बेचारे समय के मारे मासूम करते भी तो क्या करते, बहुत बार भूखे रह जाना पड़ता, क्योंकि थोड़ा बोलने का ढीठ लोगो पर असर होता नहीं और ज्यादा बोल के अपनी हड्डियां तुड़वाने में हम भी यकीन नहीं करते ।

31 दिसंबर का सर्द दिन, हम लोग चुपचाप कमरे में पढ़ाई कर रहे थे। बाकी सब एक एक करके विजिट कर गए, देखा बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं , ह्म्म्म गुड गुड बहुत अच्छे, वैरी नाइस वैरी नाइस, लगे रहो लगे रहो, पर किसी ने नहीं पुछा कि खाना क्यों नही बना रहे। एक्चुअली हमने प्लान बना लिया था कि आज कुछ स्पेशल बनाते है, दूध लेकर दही जमा दिया, आलू उबाल कर और थोड़े प्याज़ काट कर रख दिए। किसी को कानो कान खबर नही होनी चाहिए, सब कुछ मस्त प्लान के अकॉर्डिंग चल रहा था। आज की रात हम आलू के परांठे बना के गुल छर्रे उड़ाने वाले थे, बोला था न ? बेचारे मासूम, तो वैसे ही मासूम गुल छर्रे 😊। पेट में ताबड़तोड़ चूहे अपना अलग आईपीएल चला रहे थे पर सब सह कर रात होने वाली पार्टी का इंतज़ार कर रहे थे। इंतज़ार हमेशा मुश्किल होता है पर भूखे रहकर खाने के लिए इंतज़ार करना पड़े तो वो और भी डेंजर होवे है। देर से ही सही पर आखिर रात हुई, माही सब कमरों के बाहर हल्के कदमो से जाकर रेकी कर आया, कहीं कोई जाग तो नही रहा, और ये फैसला सुनाया की 12 बजे से पहले किया तो रिस्क है। बहुत भूख लग रही थी पर फिर भी थोड़ा और इंतज़ार किया , आखिर 11 बजे के आसपास सब्र का पैमाना छलका, और तवा स्टोव पर जमा कर हम तीनों उसके चारों और बैठ गए, माही ने मसाला तैयार किया, मैं परांठा बेल रहा था तो अजय उसे तवे पर पटक कर आगे पीछे से घी की मालिश कर रहा था। कि 'हो जा तैयार पट्ठे, आज छोंड़ेंगे नहीं, खीखीखीखी', लगभग आधी रात 10x10 का छोटा सा कमरा भीतर से बंद कर हम अपना सीक्रेट मिशन अंजाम तक पहुंचाने में जुटे थे।

घी के जलने से कमरा पूरा सफेद धुएँ से भर गया था, जो हमे बिना बताए कमरे के रोशनदान से बाहर निकलने लगा। उसी समय एम एससी फाइनल ईयर के स्टूडेंट कुलजिंद्र भाईजी का लघुशंका निवारण के लिए अपने कमरे से बाहर आना हुआ, कमरे के रोशनदान से बाहर आते धुएँ से उन्हें लगा की कहीं लौंडे अंदर सोते हुए जल तो नही गए। फटाफट भाग कर दरवाजा खटखटाया हमे आवाज़ लगाई, हम हड़बड़ा गए, ये क्या हुआ, अब क्या होगा, पर खुद को संयत कर वापस कहा सब ठीक है भाईजी। पर चूक हो चुकी थी, दरवाजा खोलने का हुक्म हुआ, पर हमने ना खोलने का निश्चय कर लिया था, बोले आप जाओ भाईजी कुछ नही हुआ है सोने दो आप। कुलजिंद्र भाईजी को संतोष न हुआ रोशनदान में गर्दन घुसा कर भीतर झाँका।

'ओये ए की है? प्रोण्ठे, बुआ खोल हुणे, नई ता म् होरा नू वी सद के ल्योना' (अरे ये क्या है? पराँठे, दरवाजा खोलो अभी, नहीं तो मैं अभी बाकी लोगों को भी बुला के लाता हूँ)
हालाँकि उनके इस डायलॉग का भरपूर असर हुआ था हम पर , पर अजय के दरवाजे खोलने से पहले ही कुलजिंद्र भाईजी की लात दरवाजे की चिटकनी ले उड़ी।
आराम से भीतर दाखिल होकर बिना किसी से पूछे पराँठे ठुसना शुरू कर दिया। अपनी मेहनत पर यूँ पानी फिरते देख बहुत सैड वाली फीलिंग आ रही थी, पर चुप थे। कुलजिंद्र भाईजी ने जी भर कर खाने के बाद प्रस्थान किया पर थोड़ी देर में एक के बाद एक बाकि होस्टल मेंबर आने लगे और जब सब चले गए तो पीछे लुटे पिटे से हम थे।

उसी वक़्त बाहर भड़ भड़ भड़ पटाखे फूटने का शोर होने लगा, पता लगा नया साल लग गया, हमने एक दूसरे की और देखा बोले 'हैप्पी न्यू ईयर', आटा और तैयार कर लो, पराँठा तो हमारे भाग में वैसे भी था नहीं। 😊☺😢

#जयश्रीकृष्ण

©अरुण

Rajpurohit-arun.blogspot.com

🎪🎪🎪🎪 तिरुशनार्थी ♠️♠️♠️♠️

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